देशपाल सिंह पंवार
इस समय देश में चाह का दौर है। लोकतंत्र को सुरीला साज,जनता को सुराज, नेताओं को ताज,सोनिया को काज,मनमोहन को बेहतरीन राज और यूपीए को मनमोहन ब्रिगेड पर नाज की चाह है। पर लाख हल्ला मचाने के बावजूद जिस देश की संसद में 153 दागी फिर सांसद बनकर आ बैठे हों क्या वहां ऐसा कोई काज होगा जिस पर नाज किया जा सके? मनमोहन सिंह जैसे पीएम या कहा जाए सज्जन नेता की टीम में नौ दागी मंत्री बन गए हों वहां सुरीला साज बजेगा या फिर जनता के अरमानों पर गाज गिरेगी यह महत्वपूर्ण सवाल है? हैरत तो इस बात की है कि इन नौ में से सात कांग्रेसी हैं। यानि दबाव की राजनीति का चक्र केवल सहयोगी दलों ने ही नहीं घुमाया अपनों ने भी उसका इस्तेमाल किया। जनता सब जानती है। वह यह भी समझ गई है या जल्दी ही समझ जाएगी कि इन चेहरों को लेने के पीछे आखिर कांग्रेस की कौन सी मजबूरी थी? शायद कांग्रेस फिलहाल दागी तो झेल सकती है लेकिन ऐसे जनादेश के बावजूद बागी झेलने का माद्दा पार्टी में फिलहाल पैदा नहीं हो पाया है। जब तक ये दम देश की इस सबसे बड़ी पार्टी में पैदा नहीं होगा तब तक साफ सुथरे शासन की सौ फीसदी उम्मीद करना बेमानी है। तब तक जनता के सुराज के सपने बेमानी हैं। सब जानते और मानते हैं कि कांग्रेस की जीत में बहुत बड़ा रोल मनमोहन सिंह की साफ सुथरी छवि और राहुल गांधी की कं्रातिकारी परिवर्तक की पैदा आस का है। ऐसे में जनता इस बार यूपीए सरकार को पहले से भी ज्यादा सफल देखना चाहती है। जनता का ऐसा सोचना और चाहना गलत नहीं है। लेकिन मनमोहन सिंह की पूरी ब्रिगेड पर अगर निगाह डाली जाए तो ये दोनों रेखांकन छोटे होते ही नजर आते हैं। तमाम ऐसे चेहरे और नाम हैं जो समय-समय पर फ्लाप साबित होते आए हैं पर राजनीति में टिके हुए भी हैं और यह भी एहसास कराने में सफल हैं कि देश की राजनीति उनके बिना नहीं चल सकती। कांग्रेस उनके बिना पैर नहीं उठा सकती। नौ पुराने मुख्यमंत्री में से अगर एक-दो को छोड़ दिया जाए तो बाकी ने अपने-अपने राज में किस तरह काज किया इसके बारे में सब जानते हैं। वहां विफल और यहां वे सफल होंगे इस बात की क्या गारंटी है? तमाम सहयोगी दलों के अपने-अपने एजेंडे हैं। वे अपने हिसाब से ही फैसले लेंगे। इस पर गठजोड़ की मजबूरी कैसे अंकुश लगाएगी? सबसे बड़ा सवाल यही है कि ऐसे में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के इस अल्टीमेटम के क्या मायने कि या तो काम करो या जगह खाली करो? क्या ये दोनों नीति निर्धारक ये मान चुके हैं कि टीम के कुछ खिलाड़ी न केवल जीरो पर आउट होंगे बल्कि दूसरों को रन आउट भी करायेंगे? मिशन बड़ा है। जबाबदेही पिछले राज से ज्यादा है। जनता की चाह ज्यादा है। युवाओं के सपने पूरे करने की गरज ज्यादा है। पर मनमोहन का कुनबा और पदों की बंदरबांट ज्यादा आस नहीं जगाती। इसके बावजूद अगर जनता की आकांक्षा पर पूरी टीम को खरा उतारने में मनमोहन सिंह सफल हो जाते हैं तो फिर यकीन मानिए कि यह एक चमत्कार होगा। फिर कोई उनका सामने दूर-दूर तक खड़ा भी नहीं हो पाएगा। मनमोहन सिंह ऐसा कर सकते हैं यह सबको आस है।
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