मंगलवार, 5 मई 2009

खाई बाप की कमाई



देशपाल सिंह पंवार
जिस खानदान में वो पैदा हुआ उसका उड़ीसा में भी बड़ा नाम था और देश में भी, पिता राजनीति में लीन रहते थे। बेटे के लिए समय नहीं होता था। जो उम्र खेलने-कूदने और पिता से जिद करने की थी उसमें वो अंजान चेहरों के बीच अपनों को तलाशता रहता था। अपना बनाने की बाल कोशिश करता रहता था। किस्मत की नियति देखिए सब पराए तक पिता के करीब रहते थे लेकिन उसके नसीब में नहीं था। बचपन सात साल की उम्र में देहरादून के वेल्हम स्कूल के हास्टल में जैसे-तैसे कटा। फिर दून स्कूल पहुंच गया। जैसे ही जवान हुआ तो पिता की सल्तनत से काफी दूर दिल्ली विवि में डेरा जम गया। जब बाप का हाथ बंटाने की बारी आई तो वो अमरीका चला गया। आया तब जब पिता इस दुनिया को छोड़कर जा चुके थे। इसके बाद अपनी मिट्टी से नाता जुड़ा। बचपन से जवानी तक के एकाकीपन का नतीजा कहिए या खानदान के गुण उसे शुरू से ही लेखन पसंद था। हर वो चीज पसंद थी जिसमें जीवन धड़कता है। जिंदगी का एहसास होता है। वो दिमाग से ज्यादा दिल से चलता था। पर शायद कुदरत को उसका ये अंदाज भी पसंद नहीं था। बचपन में भी उसकी मर्जी कदापि नहीं चली। उसकी कोई जिद पूरी नहीं हुई। जवानी में भी उसके जोश को रवानगी नहीं मिली और जब वो एक लेखक के रूप में अपनी जिंदगी को ढर्रे पर ला रहा था तब भी उसकी वो राह बंद हो गई। यानि राजा की औलाद होने के बावजूद कदापि अपनी कोई मर्जी वो पूरी नहीं कर पाया। था लेखक और बन गया राजनेता। खानदानी प्रोफेशन उसे कबूल करना पड़ा उस मैदान में कूदना पड़ा जिसके करीब वो नहीं जाना चाहता था। इसके बाद बाप के नाम पर सांसद बन गया। यहां तक राजनीति में उसका खुद का पैदा किया हुआ कुछ नहीं था। बाप की बोई हुई फसल को खाद-पानी देकर काटता रहा। राजनेता के रूप में जब पहली बार उसने अलग दल बनाने का फैसला किया तो वहां भी उसे बाप के नाम का ही सहारा लेना पड़ा। 54 साल की उम्र में सन 2000 में उसने पहली बार ये एहसास कराया कि वो राजनेता बन गया है। बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बन गया। इसे राजनीति की विडंबना कहें या तकदीर का फरमान-जो इंसान दिल की सुनता था, लिखाई-पढ़ाई की खाता था उसके राज में सबसे ज्यादा अत्याचार,अनाचार और दुराचर उस कौम पर हुए जो संख्या बल में कम थी। वोट की खेती काटने वाले राजनेता ऐसा अमूमन करते रहे हैं लेकिन कला के इस पारखी ने जनता की तस्वीर में जिस तरह का रंग भरा वह हैरत करने वाला है। हैरत इस बात की भी हो रही है कि अब वो कलाकार, कथाकार की तरह फैसला नहीं करता बल्कि अब वो राजनीति के नाटककार की तरह रंग बदलना सीख गया है। जिसके सहयोग से चार साल राज किया ऐन समय पर उससे ही नाता तोड़कर चला गया। पर तारीफ करनी होगी कि वो अभी तक अपने पत्ते नहीं खोल रहा है। वो माहौल को तोल रहा है। कम बोल रहा है। वो वामपंथियों के साथ दिखता है लेकिन अगर राजग की सरकार बनती दिखी तो वहां जाने में भी उसे परहेज नहीं होगा। उड़ीसा में उसकी भी प्रतिष्ठा दांव पर है और अपने बाप का नाम भी वो दांव पर लगाए हुए है। देखना यही है कि उस पर जनता दांव लगाती है या नहीं? देखना यह भी है कि केंद्र की राजनीति में उसके दांव सही साबित होते हैं या नहीं ? उसकी नजरें कटक से ज्यादा दिल्ली पर टिकी हुई हैं। सबकी निगाहें उस पर टिकी हैं। देखिए क्या होता है? गुम लेखक फिर जिंदा होगा या राजनीति का खिलाड़ी कोई नई कहानी लिखेगा। नतीजा आउट होने ही वाला है।


नवीन पटनायक

कटक में 16 अक्टूबर,1946 को जन्म। पिता प्रसिद्ध राजनेता बीजू पटनायक। पिता भी मुख्यमंत्री रहे और अब बेटा भी है। बहन गीता मेहता लेखकों की दुनिया का बड़ा नाम। बहन के पति सोनी मेहता न्यूयार्क में अलफ्रेड ए नोफ समूह के मुख्य संपादक। नवीन पटनायक की शिक्षा देहरादून के वेल्हम स्कूल में हुई। सात साल की उम्र में ही यहां हास्टल में डाल दिया गया था। इसके बाद दून कालेज देहरादून और फिर 17 साल की उम्र में उन्होंने सीनियर कैंब्रिज सर्टिफिकेट प्राप्त कर लिया था। दिल्ली विश्वविद्यालय से आर्ट में स्नातक की डिग्री पाई। इंडियन नेशनल ट्र्स्ट के संस्थापक सदस्य। राजनीति में आने से पहले तीन किताबें लिखी। ए सेकंड पेराडाइज-इंडियन कंट्री लाइफ 1590-1947, ए डेर्स्ट किंगडम और हिलिंग प्लांटस इन इंडिया। इंडिया, इंग्लैंड और अमरीका में एक-एक किताब प्रकाशित हुई। राजनीति से पहले लेखन ही प्रोफेशन था। 80 के दशक में पिता बीजू पटनायक की मौत के बाद अमरीका से लौटे। राजनीति में प्रवेश। उपचुनाव में आस्का सीट से 11 वीं लोकसभा में निर्वाचित। स्टील आदि मंत्रालयों समेत कई कमेटियों में रहे। 98 में अपनी पार्टी बनाई। बीजू जनता दल। चुनाव लड़े-सांसद बने। 2000 में बीजेपी के समर्थन से उड़ीसा में सरकार बनाई। मुख्यमंत्री बने। ईसाइयों पर लगातार अत्याचार के चलते विवादों में घिरे। चुनाव नजदीक आने पर राजग से नाता तोड़ा। तीसरे मोरचे में। बीजेपी ने समर्थन वापस लिया। अब दोनों चुनाव में अग्निपरीक्षा। वामदलों के सहयोग से फिर राज्य की सत्ता में आने की चाह।

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