सोमवार, 1 जून 2009

रेल: खेल-खेल में खेल



देशपाल सिंह पंवार
लंबे अरसे से रेल बिहार की बपौती रही है। सरकार चाहे किसी की भी बनीं 20 साल से अमूमन ज्यादातर बिहारी नेता तो रेल मंत्रालय चलाते रहे और बिहार की जनता मनमाने ढंग से रेल हांकती रही, रोकती रही। रेल बजट भी बिहार पर मेहरबान रहा और दूसरे राज्यों को मिले हक का काफी हद तक फायदा भी बिहार को होता रहा। शायद ही देश का कोई हिस्सा ऐसा हो जो बिहार के प्रमुख शहरों या कस्बों से रेल के जरिए ना जुड़ा हो। इतना ही नहीं सारे बिहार में भी रेल का जाल फैला है-लालू, राबड़ी के गांव तक। बिहार में यह आवागमन का सबसे बेहतर विकल्प भी है। कारण लालू-राबड़ी राज में सड़कों का नामोंनिशान नहीं था। सड़क से आना-जाना मुश्किल होता था। इसलिए रेलवे से बेहतर कुछ नहीं था। लंबे अरसे से रेल से चलने की आदत पड़ चुकी थी। लगातार सुविधाएं और रेलें बढ़ती चली गई। किसी भी कारण से हो पर यह बिहार के हित में था। होना भी चाहिए। देश के हर राज्य में ये स्थिति होनी चाहिए। सब जगह रेल का जाल फैला होना चाहिए ताकि सड़कों पर बढ़ते दबाव को किसी हद तक कम किया जा सके। लेकिन अरसे से वीआईपी सुविधा उठाने की आदत के चलते यह मान लेना कि वे जहां चाहेंगे-रोकेंगे, जैसे चाहेंगे-चलाएंगे की सोच विकसित होना गलत है। बिहार का वो तबका जो कहीं न कहीं लालू से सीधे और अप्रत्यक्ष रुप से जुड़ा था वह यही सोच रखता है। इसका कारण यही है कि जिस तरह लालू राज में रेलें चलती रहीं उससे वो यह मान बैठे थे कि रेल उनकी संपत्ति है। रेलवे की थीम-रेल आपकी संपत्ति है को तो उन्होंने पूरी तरह अपना लिया लेकिन उसकी आगे की लाइन-इसकी सुरक्षा करें को पढ़ने और उस पर अमल करने की उन्होंने जरूरत महसूस नहीं की। जब चाहो-जहां चाहो रेल रोक लो, बिना टिकट यात्रा करो। कोई मुंह खोले तो उसकी पिटाई करो। इसकी आदत उन्हें पड़ गई। रोकने वाला या टोकने वाला या फिर बोलने वाला कोई था नहीं। यह ढर्रा लंबे अरसे से चला आ रहा था। लालू राज में तमाम बड़ी-बड़ी ट्रेनें बहुत छोटी-छोटी जगहों पर थमती रही। यहां से कोई आमदनी भी नहीं होती थी पर रेल अपनी है तो ठहरना तो उसे पड़ेगा ही। इसी दौर में ये 33 हाल्ट बनें जिनकी मियाद 28 मई को खत्म हो गई थी। जैसे ही इसकी जानकारी जनता को हुई तो उसका मूड खराब हो गया। नतीजा तीन ट्रेन राख-करोड़ों की संपत्ति स्वाहा। फैसला बदलने को रेल मंत्रालय मजबूर। कहने को तो रेलवे के ठहराव पर जनता का गुस्सा उबला पर कहीं न कहीं इसके पीछे दूसरे भी कारण हैं। पहला-लालू की जगह ममता का गद्दी पर बैठना,अनचाही दुश्मनी की दीवार का खड़ा होना। दूसरा-इसी से जुड़ा है, रेलवे पर अब बिहार का राज ना रहना और तीसरा-इस बात का एहसास कराना लालू के हटने के बावजूद बिहार का हक कोई नहीं छीन सकता। साथ ही एक तबके की यह संदेश देने की भी कोशिश है कि लालू के हटते ही बिहार के साथ अन्याय होने लगा है। आगे और कड़े फैसले ना हो, यह आगजनी दबाव की राजनीति का भी हिस्सा है। वरना जिन हाल्ट को लेकर रेलवे को करोड़ों रुपए की चोट पहुंचा दी गई वे पटना से महज चंद किमी की दूरी पर ही हैं। सब जानते हैं कि सांसदों की सिफारिश पर हाल्ट बनते हैं और आमदनी के हिसाब से उन्हें जारी रखा जाता है तो फिर इसमें रेल,रेलवे और ममता का क्या दोष? लाख टके का सवाल यही है कि अगर लालू सत्ता में होते और यही फैसला होता तो क्या ट्रेन जलती? साथ ही अगर इन 33 हाल्ट से रेलवे को कोई फायदा नहीं हो रहा था तो चंद लोगों के फायदे के लिए रेल को आखिर यहां रोका क्यों जाए? लेकिन पटना के पास जब तीन रेल जल रही थी तो दिल्ली में फैसला बदला जा रहा था। कारण-15 वीं संसद का पहला दिन था। नई रेलमंत्री कहीं से भी यह एहसास नहीं करानी चाहती थी कि वे बिहार के प्रति बायस हैं। पर जिस तरह से इस आगजनी के बाद तुरंत फैसला बदला गया उसके दूरगामी नतीजें जरूर होंगे। यह या इससे भी ज्यादा विकट स्थिति आगे भी आएगी। बंगाल से निकली ममता की ट्रेन को बिहार से ही गुजरना होगा। अगर उसे पटरी पर दौड़ना है तो बिहार का ख्याल रखना ही होगा। लालू चाहेंगे कि बार-बार ऐसी विकट स्थिति आए और जनता उनके राज को याद करे। जितनी ज्यादा हालत बिगड़ेगी उतना ही बिहार में लालू को फायदा होगा। ऐसे में ममता को काफी एहतियात से लालू की रेल को चलाना होगा। यह ट्रेलर है इससे बड़ी घटनाओं और वारदातों के लिए मनमोहन सरकार को भी एलर्ट रहना होगा। वैसे भी इस देश में अब कोई न कोई ऐसा सख्त कानून जरूर बन जाना चाहिए जिससे देश में किसी का भी फोकट का गुस्सा गरीब रेल पर ना उतरे। इससे बड़ी शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है कि देश में जब जो चाहता है-20-30 लोगों को लेकर रेल रोक लेता है। रेलों में आग लगा देता है। ऐसे देश विरोधी लोगों से सख्ती से निपटा ही जाना चाहिए। ममता और मनमोहन की या तो समझ में आ गया होगा या जितनी जल्दी हो समझ लेना चाहिए कि लालू रेल मंत्री पद से हटें हैं, रेल बिहार की जनता के दिलोदिमाग से नहीं हटी है। इस बार ना तो कोई बिहार से मंत्री हैं। ना लालू-पासवान और नीतीश में से किसी की पार्टी केंद्र में शामिल है ऐसे में अगर रेल के मसले पर ये तीनों नेता एक हो गए तो मनमोहन सरकार को और विकट हालात झेलने पड़ सकते हैं। जिस दिन जनता के मन में यह पूरी तरह बैठ गया कि रेल उससे छीनी जा रही है उस दिन लालू को फायदा हो या नहीं पर हाथ का साथ सब छोड़ देंगे।

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