मंगलवार, 2 जून 2009

पहिए जाम

देशपाल सिंह पंवार
लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार जनरल मोटर्स का दीवाला निकल ही गया। ग्लोबल कारपोरेट जगत में किसी कंपनी के दिवालिया होने की यह सबसे बड़ी घटना है। लेहमन ब्रदर्स और क्रिसलर कंपनी पहले ही मंदी की बलि चढ़ चुकी हैं। यूं तो सबको इसकी आशंका काफी समय से थी लेकिन जिस तरह अमरीका के वित्तीय संस्थान कंगाल होते जा रहे हैं, सौ साल पुरानी जनरल मोटर्स के पहिए जाम होने से अमरीका की हालत और पतली हो जाएगी, यह तय है। ना केवल अमरीका की बल्कि सारी दुनिया पर इसका असर पड़ना तय है। वैसे तो दावे किए जा रहे हैं कि हिंदुस्तान इससे अछूता रहेगा लेकिन हिंदुस्तान में निर्माणाधीन इंजन ट्रांसमिशन प्लांट के लिए कंपनी को धन जुटाने में दिक्कतें आने लगी हैं। कर्ज देने वाले असमंजस में है। कंपनी की लगातार बिक्री घटती जा रही है।कंपनी को हिंदुस्तान में 20 करोड़ डालर चाहिए लेकिन दिवालिया होने के बाद जो वित्तीय संस्थान आगे कदम बढ़ा रहे थे उन्होंने •भी पैर वापस खींच लिए हैं। इससे विदेशी पूंजी निवेश की मनमोहन की प्रक्रिया को भी धक्का लगने की आशंका पैदा हो गई है। इतना ही नहीं नई युवा पीढ़ी की आशाओं पर भी कुठाराघात हुअ है। जहां तक अमरीका का सवाल है तो क्रिसलर के बाद ओबामा के कार्यकाल का यह एक और काला दिन माना जा रहा है। जनरल मोटर्स और क्रिसलर के दिवालिया होने से तकरीबन ढाई लाख लोगों के बेरोजगार होने का खतरा तो मंडरा ही रहा है साथ ही ओबामा सरकार की नीतियों के प्रति भी अमरीकी जनता में अविश्वास पैदा होने का डर सताने लगा है। जब ओबामा ने अमरीका की बागडोर थामी थी तो सारी जनता और सारी दुनिया को यही आस थी कि वे अपने जादुई चरित्र की तरह कोई जादू की छड़ी जरूर घुमाएंगे और सारी दुनिया को मंदी के संकट से निकालने में कामयाब हो जाएंगे लेकिन ये हो नहीं सका। मंदी के जाने की आस लगाई सारी दुनिया को जनरल मोटर्स के दिवालियापन ने फिर डरा दिया है। बाजार में मांग घटने का खतरा फिर मंडराने लगा है। मांग घटेगी तो मंदी से आने वाले समय में निजात मिलने के आसार नहीं हैं। जनरल मोटर्स काफी समय से बेलआउट पैकेज की सांस के सहारे जिंदा थी। वह और धन चाह रही थी लेकिन ओबामा इस पर तैयार नहीं हुए। जैसे ही दबाव में दिवालिएपन के लिए कंपनी ने सोमवार को आवेदन किया तो शेयरों के दाम 32 फीसदी लुढ़क गए। जीएम को कर्ज देने वाले भी अरबों डालर की चपत लगवा बैठे। लक्ष्मीनारायण मित्तल समेत तमाम कर्जदाताओं की कुल रकम 172 अरब डालर से ज्यादा है जबकि कंपनी की कुल संपत्ति 82 अरब डालर है। ऐसे में इसकी देनदारी चुकता होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। हां दिवालिया होने के बाद समझौते के तहत कंपनी में 60 फीसदी हिस्सेदारी अमरीका सरकार ने खरीद ली है। नतीजन जनरल मोटर्स अब गवर्नमेंट मोटर्स कहलाएगी। लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि कितने दिन? सरकार खुद इससे निकलना चाहती है। दूसरी कंपनियां इस खाली जगह को हथियाना चाहती हैं लेकिन साथ ही साथ मंदी से बंदी की ओर जाने का डर भी उन्हें सता रहा है। सौ दिन पुरानी इस कंपनी के बंद होने से बाजार अब कितने दिन में संवरेगा यह देखने वाली बात होगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें