
देशपाल सिंह पंवार
हिंदुस्तान की महानता के किस्सों से इतिहास अटा पड़ा है। हमारे लोकतंत्र की आन-बान और शान के प्रति सारी दुनिया आसक्त है। सब इस बात को जानते भी हैं और मानतऐ भी हैं कि लोकतंत्र हो तो हिंदुस्तान की तरह। इसी लोकतंत्र की इबारत में एक और सुनहरी पन्ना मंगलवार को उस समय जुड़ गया जब लोस अध्यक्ष की कुर्सी पर पहली बार कोई महिला और वो भी आसीन हुईं। मीरा कुमार एक ऐसा नाम जिन्हें हर कोई जानता है। राजनयिक से राजनेता बनीं मीरा कुमार का इस गद्दी पर बैठना हर हिंदुस्तानी के लिए गौरव की बात है। एक जमाने में सामाजिक विसंगतियों की जकड़न के लिए चर्चित इस देश ने एक नया इतिहास लिख डाला है। जिस तरह सदन में हर दल और हर नेता ने सारी हदों को तोड़कर एक सुर से उनका स्वागत और समर्थन किया है यह भी काबिले तारीफ है। इससे साफ जाहिर है कि राजनीति के क्षेत्र में भी अब नए अध्याय लिखे जाएंगे। मीरा कुमार की अध्यक्षता में भी संसद नए इतिहास कायम करेगी इसमें किसी को संदेह नहीं है। वो दिवगंत कांग्रेसी नेता जगजीवन राम की बेटी हैं। विदेश सेवा का उन्हें लंबा तजुर्बा रहा है। 85 से वे राजनीति में हैं। पांच बार सांसद चुनी जा चुकी हैं। उनकी स्वीकार्यता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे बिहार की सासारामैं सीट से भी जीतती हैं और दिल्ली की करोलबाग सीट से भी । कई महकमों की मंत्री रह चुकी हैं। तमाम दौर देख चुकी हैं। सदन में तमाम दिग्गज नेताओं से सीख चुकी हैं। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि वे इस दायित्व को बखूबी निभा एंगी। सबको यही आस है। देखने वाली बात यही होगी कि वे किस तरह मुंह फट नेताओं को सदन में कंट्रोल करती हैं? फिलहाल तो उनके इस गद्दी पर बैठने से देश के सामाजिक ताने-बाने से वे सुर निकल रहे हैं जिन्हें सुनकर कदापि मन नहीं उबता। वैसे कुदरत का इंसाफ देखिए-देश का इतिहास हर दौर में नारी शक्ति के पन्नों को समेटता रहा है और लोकतंत्र में इसकी बयार और तेज बहने लगी है। इस समय देश की राष्ट्रपति महिला है। लोस की स्पीकर महिला है। देश के सबसे बड़े दल की मुखिया महिला है। देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री महिला है। देश के सबसे बड़े गैर सरकारी बैंक की मुखिया महिला है। अगर सब गिनाने बैठा जाए तो पूरी किताब तैयार हो जाएगी। बाकी तमाम प्रतिष्ठित पदों पर भी महिलाओं का बैठना इस देश की गरिमा को भी दर्शाता है। सामाजिक ताने-बाने की मजबूती को भी दिखाता है। समाज में बराबरी के एहसास को भी बढ़ाता है। साथ ही चंद छोटी सोच के उन लोगों को भी चिढ़ाता है जो कहीं न कहीं महिलाओं के रोल, काबलियत और हक पर डाकामारी करने की घटिया नाकाम कोशिश करते रहते हैं। अब उस दिन का इंतजार है जब राजनीति में भी महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का हक मिलेगा। ऐसा होगा यह तय है। हां कुछ ताकतें उसकी मियाद बढ़ा सकती हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें