शनिवार, 4 जुलाई 2009

ममता एक्सप्रेस-सुहाना सफर




देशपाल सिंह पंवार
राजनीति का दायरा बढ़ा है। देश नेताओं से अटा पड़ा है पर मानना पड़ेगा कि ममता की बात ही अलग है। तमाम कट्टर विरोधी भी मानते हैं कि वो दूसरों से अलग है। जो नहीं मानते वो इस रेल बजट के बाद मानने लगेंगे। जैसा नाम-वैसा काम। गरीब जनता का ख्याल दिल में है। जिद केरेक्टर में कूट-कूटकर है। शायद यही एक कारण है कि वो जो चाहती हैं, कर गुजरती हैं। अगर नहीं कर पाती तो सब कुछ छोड़कर जनहित की अपनी पुरानी राह पर फिर अकेली निकल पड़ती हैं। उनका इतिहास ऐसा ही है। उनका नाम ऐसा ही है। वो अपने नाम और जनता के काम के हिसाब से ही चलती हैं। किसी को पसंद आए तो ठीक-ना पसंद आए तो उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वो जनता को बरगलाने के वादे नहीं करतीं। जन्मजात उनकी नेचर ही ऐसी है जिससे वादे नहीं करने के इरादे झलकते हैं। चाहे ममता ने तीसरी बार रेल बजट पेश किया हो, सबसे कम 15 दिन का समय मिला हो इसके बावजूद इस रेल बजट पर ममता की छाप है। लालू आंकड़ों की बाजीगरी से सुपरहिट खजाना शो दिखाते थे। जनता को बरगलाते थे। चालाकी से जेब काटते थे। फिर उस पर इतराते थे। ताली बजवाते थे। उनके लिए खजाना और रेलवे का मुनाफा नंबर एक पर था। ममता के लिए जनता पहले है और रेल बाद में। समय की कमी के बावजूद उनकी घोषणाएं बताती हैं कि वे जनता की चाह को भी जानती हैं और रेलवे की थाह को भी, यात्रियों से उन्होंने लिया कुछ नहीं। हां दिया बहुत कुछ है। वो भी जो लालू ने छीना था, वो भी जो जनता चाह रही थी। साथ ही ये एहसास भी कराया है कि रेलवे आपकी है। आपके साथ है। चर्चा चाहे लालू माडल की हो रही हो पर बजट साफ-साफ दर्शा रहा है कि ममता के रहते रेल लालू (धन) की लाइन पर नहीं दौड़ सकती उसे जनता एक्सप्रेस बनना ही होगा। ऐलान के मुताबिक इसे सीधा सादा जनता का रेल बजट भी कह सकते हैं और ड्रीम भी, इस पर लालू प्रसाद को ऐतराज हो सकता है। मनमोहन सरकार में बैठे तमाम दिग्गजों को जलन हो सकती है। पर इसमें कोई दो राय नहीं कि युवाओं, महिलाओं और मजदूरों का दिल ममता ने और जीत लिया है। इसके दबाव में अब प्रणव दा भी जरूर रहेंगे और प्रधानमंत्री भी, वैसे अजीब स्थिति है एक तरफ मनमोहन सरकार के खजाना और तेल मंत्री जन पर घन चला रहे हैं। दूसरी ओर रेल मंत्री जन के मन को अपना बना रहीं हैं। यानि कोई लुटता है, ममता लुटाती हैं। यानि सरकार एक और एजेंडे अलग-अलग। सरकार के दो चेहरे। दूसरे मंत्रियों की तरह ममता का कोई सौ दिन का एजेंडा नहीं है। वे ना किसी दबाव में हैं। घोषणाओं से साफ झलकता है। वे जानती हैं जनता को क्या चाहिए? सबको क्या चाहिए?-रेल किराया नहीं बढ़ाया। तत्काल के झंझट और सीटों के संकट को निपटा डाला। चार्ज अब 100 और मियाद बस दो दिन। डाकघरों से आसानी से टिकट मिलेंगे। मोबाइल वैन भी इसके लिए दौडेंगी। रेल स्टेशनों पर लाइनें नहीं लगेंगी। गरीबों के लिए इज्जत स्कीम के तहत मात्र 25 रुपए के पास पर सौ किमी की यात्रा की सुविधा। छात्रों और पत्रकारों को भी विशेष छूट। युवा ट्रेन चलाने का फैसला। स्टेशनों पर जनता खाना। 57 नई ट्रेनें चलेंगी। महिलाओं के लिए भी ट्रेन चलेगी। 12 ट्रेन ऐसी होंगी जो कहीं नहीं रूकेंगी। 50 स्टेशन विश्वस्तरीय बनेंगे। 375 को माडल स्टेशन बनाया जाएगा। रेलवे की जमीन पर नर्सिंग कालेज और बाजार खुलेंगे। इंटरसिटी रेलों में भी एसी कोच होंगे। लंबी दूरी की रेलों में डाक्टर भी होंगे और मनोरंजन तथा दूरसंचार के साधन भी, साथ ही रेलों में सुरक्षा के लिए भी तमाम फैसले किए गए हैं। कमांडो बटालियन होगी। महिलाओं की सुरक्षा के लिए महिला सुरक्षाकर्मी तैनात होंगे। रेलवे की विवादास्पद रोजगार पालिसी की समीक्षा ताकि पिछड़ों का ज्यादा रोजगार दिया जा सके। धंधा करने वालों का भी ध्यान रखा गया है। कोई माल किराया नहीं बढ़ाया गया है। बल्कि मालगाड़ियां और बढ़ाई जाएंगी ताकि आसानी से और जल्दी माल इधर से उधर पहुंच सके। बंगाल में डिब्बों की एक और फैक्ट्री खुलेगी। स्टेशनों पर एटीएम खुलेंगे। स्टेशनों की कायापलट के लिए निजी क्षेत्र को साझीदार बनाया जाएगा। रेल कर्मचारियों के लिए 6650 मकान बनेंगे। सारे देश में रेल का जाल बिछाया जाएगा। उम्दा बनाया जाएगा। ट्रेनों को समय पर चलाया जाएगा। इसके अलावा भी तमाम ऐसी घोषणाएं हैं जो साफ बताती हैं कि ममता की जनता एक्सप्रेस सही राह पर दौड़ेगी। हाईटैक बनेगी। कमाएगी भी और सबका ध्यान भी रखेगी। रेलवे भले ही लालू फोबिया के तले चलती रही हो पर ममता ने इसकी परवाह नहीं की। एक भी उन्होंने लालू को तरजीह नहीं दी। हां आदत के मुताबिक लालू की टोका टाकी जारी रही। नोंकझोंक भी हुई। यह आगे भी चलेगी। लालू चुप बैठने वाले नहीं और ममता झुकने वाली नहीं। इस बजट ने यह भी साफ कर दिया है कि आंकड़ों में लालू ने कहीं न कहीं बाजीगरी तो की है। लालू जो मुनाफा दिखाते रहे हैं ममता के आंकड़े कुछ और ही कह रहे हैं। रेलवे के पास अब 12 हजार करोड़ से ज्यादा का ही धन है। जनता को दूध का दूध और पानी का पानी नजर आए इसके लिए ममता पांच साल के कार्यकाल पर श्वेत पत्र जारी करेंगी। तस्वीर सामने होगी। लालू का सिरदर्द और बढ़ने वाला है। शायद उनकी झल्लाहट का यह भी कारण हो। यूं तो अब तक जितने रेल मंत्री हुए हैं अमूमन सबने अपने राज्यों की लाटरी निकाली है। दिया बंगाल को ममता ने भी है पर आंख बंद करके नहीं। किसी को इस पर ऐतराज नहीं होगा। हां इस बात में कहीं न कहीं ममता भी चूक गई हैं कि वो सब राज्यों के साथ न्याय नहीं कर पाईं। चाहे छत्तीसगढ़ हो या हरियाणा। चाहे महाराष्ट्र हो या कर्नाटक। ऐसे तमाम राज्य कम से कम ममता से ज्यादा आस कर रहे थे। जहां तक बिहार का सवाल है तो पिछले 15 साल में ज्यादातर बिहार से ही कोई ना कोई रेलमंत्री बनता था इसी वजह से वहां के लिए सारी सुविधाओं के दरवाजे खुले रहते थे। वो वीआईपी राज्य रहा है पर इस बार मनमोहन सरकार में एक भी मंत्री नहीं है। लालू इसे मुद्दा बनाने की कोशिश जरूर करेंगे। इससे ममता को निपटना ही होगा। वैसे प्रधानमंत्री समेत सारे सत्ता पक्ष ने इसे शानदार बजट कहा है। उनकी तरफ से इसकी ही उम्मीद थी। हां विपक्षी दल बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह की टिप्पणी काबिले गौर है। वे कहते हैं कि बजट में जो वादे किए गए हैं वे पूरे हों तभी इसे अच्छा कहा जाएगा। यानि वादें अच्छे हैं ये वो भी मानते हैं। असल में ममता की यही अग्निपरीक्षा भी होगी। घोषणाएं सुनने में अच्छी लग रही हैं। जनता उन्हें देखना भी चाहती है। तभी माटी मानुष की थीम की बीम पड़ेगी।

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