
देशपाल सिंह पंवार
वेसे तो सौ दिन के एजेंडे और रेल बजट से सरकार की चाल के संकेत मिल रहे हैं पर आज जब प्रणब मुखर्जी का ब्रीफकेस खुलेगा तो ही पता चलेगा कि मनमोहन सरकार की नीतियां और प्राथमिकताएं आखिर क्या हैं? अटकलों के दौर जारी हैं। क्या है दादा का इरादा? क्या ये आम आदमी का बजट होगा? मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था को सुधारेगा या आम आदमी की सेहत और बिगाड़ेगा? रोजगार के दरवाजे फिर खुलेंगे? नौकरीपेशा की टेंशन कम होगी? बाजार में फिर रौनक लौटेगी? गरमी में ये ठंडक लेकर आएगा? गरीब-किसान-मजदूर का बेड़ा पार होगा? ऐसे तमाम सवाल हैं जो जनता के दिमाग में उठ रहे होंगे। ये सारे मसले बजट तैयार करते समय दादा के सामने भी रहे होंगे। समय कम मिला है फिर भी देश के इस सबसे ज्यादा अनुभ वी वित्त मंत्री के लिए यह जानना मुश्किल नहीं रहा होगा कि जनता क्या चाहती है? देश क्या चाहता है? जो हालात सामने हैं यही लगता है कि यह पापुलर नहीं पीपुलिस्ट बजट होगा। गांव और गरीबों पर ज्यादा ध्यान होगा। शहरी मध्यम वर्ग को झटका लगेगा। कुछ लोक हित के फैसले हो सकते हैं पर ज्यादा आस पालने की जरूरत नहीं है। मौके की नजाकत •भी यही है। देश की अर्थव्यवस्था को ताक पर रखकर शायद ही कोई फैसला हो। इसकी आस दादा से तो नहीं लगायी जा सकती। शायद इसी वजह से आम आदमी, शेयर बाजार और कारपोरेट सेक्टर इस बजट पर ज्यादा उत्सुक नजर नहीं आ रहा है। हो सकता है कोई जादू की छड़ी दादा घुमाने में कामयाब हो जाएं। वैसे देता वही है जिसके पास होता है। प्रणब दा के पास क्या है-पहले यह देखना होगा। जनता की परेशानी बढ़ती महंगाई है। युवाओं की परेशानी बढ़ती बेरोजगारी है। नौकरीपेशा की टेंशन घटती आय है। बाजार की परेशानी ग्राहक की जेब में पैसा नहीं है। वे सब आस में हैं। उधर बढ़ता राजस्व व वित्तीय घाटा और घटती विकास दर सरकार की सबसे बड़ी परेशानी बन गई है। विकास दर सात फीसदी तक लाने की जद्दोजहद चल रही है। केंद्र और राज्यों का घाटा मिलकर 10 फीसदी के पार चला गया है। सरकार की कमाई घट गई है। वैसे भी जब आमदनी के मुकाबले खर्चा एक सीमा को पार कर जाए तो या तो खर्चा घटाना होता है या जनता पर बोझ पड़ता है। सरकार के खर्चे घटाने के कोई संकेत या संदेश मिल नहीं रहे हैं। सीन वही है। ऐसे में हो सकता है कि बजट उतना अच्छा ना हो जितना बाजार समझता है। सरकार को पैसा चाहिए-कहां से आएगा-जाहिर सी बात जनता की जेब से। पूरे आसार हैं कि सेवा कर फिर 12 फीसदी हो जाएगा। 96 फीसदी देश में उत्पादित चीजों पर सेंट्रल वैट की दर 8 से 10 फीसदी होने के आसार हैं। यह भी डर है कि टैक्स पर नया सेस ( एजुकेशन के अलावा) लगा दिया जाएगा। इसे सोशल सेक्टर को मजबूती देने का तर्क कहा जाएगा। तय है बजट का जोर इसी सोशल सेक्टर और ढांचागत विकास पर होगा। गांव और गरीब के लिए योजनाओं का ऐलान होगा। मौजूदा योजनाओं का बजट बढ़ेगा। यूपीए ने अपने घोषणापत्र में ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में मजदूरी बढ़ाकर सौ रुपए करने का वादा किया था। लोगों को खाद्य सुरक्षा मुहैय्या कराने की बात की थी। रमन सरकार की तर्ज पर 3 रूपए किलो चावल देने की बात की थी। इसे पूरा करना ही होगा। इस पर 30 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च होगा। कहां से आएगा-सोचना होगा। बस देखना यही है कि यह पूरे देश में एक साथ होता है या धीरे-धीरे। सीधे दिया जाएगा या टिकट के जरिए। साथ ही साथ शिक्षा, सड़क, बिजली,पानी और सेहत को सुधारने की बात की जाएगी। आयकर समेत अन्य डायरेक्ट करों पर वित्त मंत्रालय उदार नजरिया दखाने के मूड में लग रहा है। दादा की झोली से अगर सबसे ज्यादा कुछ मिल सकता है तो वह है हाऊसिंग लोन पर मिलने वाली टैक्स छूट। वह बढ़ सकती है। इसे डेढ़ लाख से बढ़ाकर ढाई लाख करने के आसार हैं। ज्यादा मेहरबान रहे तो मुख्य धन पर 80 सीसी की लिमिट बढ़ा सकते हैं। इससे बचत और निवेश दोनों बढ़ेंगे। अगर ऐसा हुआ तो नौकरीपेशा तबके की वाहवाही जरूर दादा लूट लेंगे। अगर नहीं हुआ तो फिर वही पुराना कोसने का दौर चलेगा। इसी तरह फ्रिंज बेनिफिट और अप्रत्यक्ष करों की भी समीक्षा जरूर की गयी होगी। सरकार की मंशा चमड़ा, रत्न, कपड़ा और उन सभी सेक्टरों को तवज्जों देने की भी लग रही है जो मंदी से ज्यादा चौपट हुए हैं। रोजगार खत्म हुए हैं। सरकार के सामने इस समय चुनौती मंदी से निपटने, महंगाई पर नियत्रंण पाने,रोजगार के अवसर पैदा करने, बाजार को उबारने, आम आदमी की आमदनी बढ़ाने और विकास का पैसा सही स्थान पर ज्यादा लगाने की हैं। जहां तक महंगाई का सवाल है तो बजट से ऐन पहले जिस तरह तेल के दाम बढ़ाए हैं उससे तो नहीं लगता कि सरकार की राह सही है? मुद्रा स्फीति की दर एक के नीचे पहुंच गई है। हर चीज के दाम पहले ही आसमान पर हैं। अब बजट के बाद रही-सही कसर और पूरी हो जाएगी। आम आदमी की थाली और पेट खाली रहना तय है? वैट बढ़ाने से महंगाई दर और बढ़ेगी। लाख टके का सवाल यही है कि ऐसे में मनमोहन सरकार किस मुंह से आम आदमी की सरकार का दावा करती है? यह भी अजीब विडंबना है कि सरकार महंगाई को थोक सूचकांक से नापती है और जनता फुटकर से लेती है। दोनों में जमीन आसमान का अंतर । इसी वजह से सरकार को नहीं पता चलता कि जनता किस हाल में है? इसे बदलने की जरूरत है। प्रणब दा शेयर बाजार सूचकांक के बल पर सोचते और बोलते आ रहे है कि मंदी का भरत पर ज्यादा असर नहीं है। वो मजबूत है। लेकिन सवाल यही पैदा होता है कि शेयर बाजार से कितनी फीसदी जनता का सीधा वास्ता है? क्या वो सही तस्वीर दिखा सकता है? बजट से पता चलेगा कि वे मन रखने के लिए कह रहे थे या हकीकत में स्थिति ज्यादा खराब है। अगर वो कड़वे फैसले लेते हैं तो साफ है कि उनके पहले के कथन सच नहीं थे। यही उनकी अग्निपरीक्षा है कि वे देश को ग्रोथ की दिशा में लेकर जाएं। रोजगार के अवसर पैदा करें। जनता को खजाना फुल करने की मशीन की तरह ना इस्तेमाल किया जाए। इसमें कोई दो राय नहीं कि दादा चिदंबरम की तरह कर छूट देकर दूसरे रास्ते से वसूलने की कला में माहिर नहीं हैं पर उनके पास बाजार से धन उगाहने का विनिवेश मंत्र है। इसे इस्तेमाल करने से वे शायद ही चूकें। इससे बाजार को थोड़ी आस तो बंधती ही है। सब दादा से 82 जैसे बजट की आस लगाकर चल रहे हैं जब उन्होंने सारी दुनिया की वाहवाही लूटी थी। उस वक्त उन्हें तजुर्बा भी नहीं था। अब तो वो दादा हैं। सबका हित जरूर करेंगे।
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