देशपाल सिंह पंवार
कन्याकुमारी से कश्मीर तक हमारे देश की बनावट ऐसी है कि साल दर साल अमूमन कुदरत की मार झेलता ही रहता है। ज्यादातर हिस्सा खेती के सहारे चलता है इस वजह से गरमी हो सर्दी या फिर बारिश किसान की हालत पतली ही रहती है। खासकर गरमी और बारिश से। तमाम विख्यात महानगर भी इससे बचे नहीं हैं। यूं तो सारा देश ही इस बार की गरमी में पेयजल को तरसता नजर आया लेकिन सपनों की नगरी मुंबई की हालत दूसरी ही है। वहां की जनता पानी में डूबती भी है और दो बूंद पानी को तरसती भी रहती है। चाहे पानी के अथाह सागर के किनारे ये शहर बसा हो, चारों ओर पानी हो, यहां की बरसात का भी कोई विश्वास ना हो लेकिन पानी के साथ रहने वाला हर शख्स जानता है कि यहां पानी की क्या कीमत है? दो दिन पहले बारिश से औद्योगिक नगरी जाम थी अब पानी को लेकर त्राहिमाम है। जिन झीलों से पानी की आपूर्ति होती थी वो बारिश की कमी से फुल हो नहीं पा रही हैं। सूखी ही रह जा रही हैं। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां पानी राशनिंग में भी कटौती हो गई है। मंगलवार से आपूर्ति 30 फीसदी तक घटा दी गई है। अगर पानी पर्याप्त मात्रा में रहता है तो रोजाना 3400 मिलियन लीटर पानी की आपूर्ति बीएमसी करता है लेकिन अब यह आंकड़ा तीन हजार मिलियन के नीचे पहुंच गया है। होटलों को स्विमिंग पूल के लिए पानी का खुद बंदोबस्त करने को कहा गया है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि वे पानी को बर्बाद ना करें। मुंबई वासियों को तयशुदा घंटों में पानी मिल रहा है और वो भी इस हिदायत के साथ की वो किफायत बरतेंगे। महाराष्ट्र सरकार भी चिंतित है और पानी देना वाला महकमा भी, मानसून की रफ्तार ने सरकार की चाल और जनता के हाल बिगाड़ दिए हैं। पानी का धंधा करने वालों की पौबारह है लेकिन जिनकी जेब में पैसा नहीं है वे ऊपर वाले के सहारे जी रहे हैं। केंद्र सरकार ने मुंबई के ड्रेनेज सिस्टम को ठीक करने के वास्ते तो 300 करोड़ ज्यादा देने का प्रावधान आम बजट में कर दिया लेकिन पानी की किल्लत कैसे दूर होगी इसका इलाज अभी तक ना तो महाराष्ट्र सरकार ने तलाशा है और ना ही केंद्र सरकार ने। बीएमसी हो महाराष्ट्र सरकार दोनों ही बादलों को ताकते रहते हैं। शायद वहीं से इस आफत से राहत मिले। मिलेगी भी वहीं से लेकिन कब इसका पता किसी को नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक यूं ही सारी जनता को आकाश ताकने के लिए मजबूर किया जाएगा? साल दर साल यह दिक्कत और बढ़ेगी ऐसे में कोई स्थाई हल क्यों नहीं निकाला जाता? आदमी बिना सड़क रह सकता है,चल सकता है लेकिन क्या हवा और पानी के बिना गुजारा है? प्यासी जनता के सब्र का ज्यादा इम्तिहान घातक हो सकता है। केंद्र सरकार को भी इस बार पेयजल संकट से सबक जरूर लेना चाहिए था पर ये हो ना सका।
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