सोमवार, 23 मार्च 2009

पाक की नापाक सोच

देशपाल सिंह पंवार
बातें,कुछ किस्से,कुछ हादसे,कुछ स्कैंडल,कुछ साजिशें ऐसी होती हैं जिनके बारे में पता तो सारी दुनिया को चल जाता है पर अनकही बातों को बेसिरपैर की बताकर उड़ाने वालों की संख्या हमेशा ज्यादा ही रहती है। हां इनसे जुड़ा या जिम्मेदार कोई व्यक्ति समय और परिस्थिति के मद्देनजर जब अपना मुंह खोलता है तो एकबारगी राजफाश का एहसास जरूर होता है। फिजां में सवाल तैरते हैं कि आखिर अब बोलने के पीछे का राज क्या है और फायदा क्या है? कारगिल जंग एपिसोड ऐसा ही है। एक तरफ दोनों देशों की फिजां में अमन-चैन के गीत गूंज रहे थे,दोस्ती की नई इबारत लिखी जा रही थी, दोनों गले मिलते नजर आ रहे थे वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना में हथियारों की धार से रिश्तों पर वार की साजिश रची जा रही थी। जंग हुई। रिश्ते बिगड़े। नवाज शरीफ सत्ता से बेदखल हुए और देश से भी,सेना ने उनके साथ क्या किया, यह सारी दुनिया ने टीवी पर देखा,अखबारों में पढ़ा, कानों से सुना। साजिश रचियता सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ परंपरा मुताबिक देश के मुखिया बन बैठे। सबका दौर होता है। समय का पहिया घूमता गया। मुशर्रफ के पाप का घड़ा भरता गया तो शरीफ को जोश आने लगा। कारगिल जंग का किस्सा हर जगह बताने लगे। असली खलनायक मुशर्रफ को गरियाने लगे। खुद को शरीफ ठहराने लगे। उनकी हर बात सच नजर आती है लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि आखिर उस समय शरीफ ने जंग की जिम्मेदारी क्यों ली? सेना ने साजिश रची, इसका खुलासा क्यों नहीं किया? क्या केवल जान के डर से? क्या जान देश हित से बढ़कर है? अगर ऐसा है तो फिर इस बात की क्या गारंटी कि फिर तख्तापलट की हुबहू ऐसी ही फिल्म नहीं बनेगी? ऐसे में यहां लोकतंत्र का यह ढोंग क्यों? चाहे जो हो लेकिन शरीफ के शरीफाना खुलासे ने यह तो साबित कर ही दिया है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र के बारे में सोचना,बातें करना और दावे करना बेमानी है। सबसे बड़ा कड़वा सच यही है कि प्रधानमंत्री सेना के इशारे पर नाचता है, सेना कट्टरपंथियों की बांदी नजर आती है और कट्टरपंथी इस्लाम के नाम पर जंगलराज चलाते आते है। जेहाद के नाम पर कौम कुर्बान-देश कुर्बान-सारी दुनिया का अमन-चैन कुर्बान। ऐसे बेकाबू हालात की लपटों से हम कब तक बचेंगे यह हिंदुस्तान के सामने सबसे बड़ा सवाल है? लाहौर में अपनी पार्टी की आपात बैठक में मियां नवाज शरीफ और ज्यादा शरीफ नजर आए। उनकी सारी बातें मुशर्रफ विरोधियों और हमें अच्छी लग सकती हैं लेकिन ऐसी बातों को इस समय इतने पुख्ता तरीके से बोलने के निहितार्थ हैं। शरीफ राजनेता हैं- जिया उल हक, मुशर्रफ जैसे घाघ और बेनजीर जैसी शातिर राजनेता को झेल चुके हैं। वे समय की नब्ज को पहचानते हैं। मुशर्रफ को हटाने के लिए उन्होंने बेनजीर का सहारा लिया। अगर बेनजीर की हत्या नहीं होती तो तय था कि वो प्रधानमंत्री की कुर्सी तक जरूर पहुंचते। हमदर्दी की लहर से आसिफ अली जरदारी को राजपाट तो मिला पर शरीफ समय के हिसाब से चलते रहे। सत्ता में शामिल हुए लेकिन जैसे ही लगा कि इस सरकार में रहने से उनकी किरकिरी होगी वो अलग हो गए। वे जानते थे कि जरदारी कमजोर राजनेता हैं। न सत्ता पर पकड़ रहेगी और न ही सेना पर। यह सोच सही साबित हो गई। तालिबान के सामने जरदारी ने जिस तरह घुटने टेके हैं उससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खासकर अमरीका की नजर में जरदारी का रेट खराब हुआ है। स्वात घाटी में पाक का शासन नहीं रहा। तालिबानी जंगलराज कायम हो गया है। मीडिया ने वहां से नाता तोड़ लिया है। सेना का सहयोग अलग से तालिबानियों को मिल रहा है। उपर से पाक जनता हिंदुस्तान से बेहतर रिश्तों की आस लगाये बैठी है। यह जब हो सकता है जब वहां अमन-चैन हो पर जरदारी हर फं्रट पर जीरो पर आउट होते नजर आ रहे हैं। जिस तेजी से वहां हालात बिगड़ते जा रहे हैं- या तो वहां फिर सेना की हुकूमत जल्दी ही देखने को मिले या फिर लोकतंत्र के नाम पर अकेले शरीफ ही दिखाई देंगे। ऐसे में शरीफ के लिए हिंदुस्तान का समर्थन काफी मायने रखता है। यही वजह है कि शरीफ और शरीफ हो गए हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस देश में हुकूमत सेना और कट्टरपंथियों के रहमोकरम पर चलती हो वहां शरीफ किस बिना पर लोकतंत्र के ख्वाब देख रहे हैं या किस तरह चला पाएंगे? सेना और तालिबानियों को वहां काबू केवल बेनजीर ही कर सकती थी जिन्हें वो पहले ही रास्ते से हटा चुके हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि इस हत्या की साजिश के पीछे कहीं न कहीं जरदारी थे। खैर सीमा पार चलता कमजोर शासन शरीफ को फायदा पहुंचा सकता है लेकिन हमारे लिए वो सबसे बड़ी खतरे की घंटी है। जब तक अमरीका तालिबानियों से उलझा हुआ है खतरा थोड़ा दूर है लेकिन अगर वो इस मोरचे पर पिटा तो यह तय है कि पाक सेना, कट्टरपंथियों, मदरसों के सहयोग से सूदखोर बनिया के ब्याज की तरह बढ़ रही तालिबानियों की फौज का अगला निशाना हिंदुस्तान ही होगा। वह चंद कदम दूर है। पास आने से पहले ही उसे इतना दूर करना होगा कि फिर ये संकट न आए। फिलहाल चुनाव का खुमार है, क्या हमारी सरकार इसके लिए तैयार है? (22.2.09)

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