देशपाल सिंह पंवार
दुनिया को ज्ञान है-जन,गण,मन हिंदुस्तान का मान है। गणतंत्र दिवस हमारा ईमान है। लहराता तिरंगा हमारी आन-बान और शान है। राजपथ हमारी शराफत और ताकत का गान है। देशप्रेम की हर दिल में गूंजती तान है। जिसे सुनता हर कान है। दिल से गुनगुनाता और मानता हर इंसान है। भारत माता हमारी जान है। हर देशवासी को इस पर अभिमान है। आखिर क्यों न हो, जब हमने आजादी हासिल की थी तो सारी दुनिया ने कहा था कि यह देश न तो एक रह पायेगा और न ज्यादा दिन चलेगा। एक दिन आंतरिक झगड़ों में फंसकर बिखर जायेगा। हुआ ठीक उल्टा-ऐसा बोलने और सोचने वाले खुदा को प्यारे हो गये और हिंदुस्तान तरक्की की राह पर आगे बढ़ता चला गया। सबकी आंखें फटी रह गयी। हमारा बुरा सोचने वाले और हम पर बुरी नजर रखने वाले लगातार मात खाते चले गए। तमाम अवरोध, चुनौतियों और दिक्कतों के बावजूद हमने दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का रूतबा हासिल किया। उसे आगे बढ़ाया। आसमान की बुलंदियों तक पहुंचाया। हर देश हमसे दोस्ती की चाह रखने लगा। देश में हर धर्म, हर व्यक्ति को पनपने और फूलने का पूरा अवसर मिला। भाईचारा बढ़ा। अनेकता में एकता की ऐसी बेमिसाल रीत पड़ी कि तमाम झंझावत भी डिगा नहीं पाए। यह सब हमने हासिल किया अपने संविधान की बदौलत। जिसे आजादी के तीन साल बाद आज के दिन ही हमारे पुरोधाओं ने बनाया था। लागू किया था। आजादी गोरों से मिली थी संविधान पर थोड़ा-बहुत असर ब्रिटिश संविधान का रहना लाजिमी था। हां बनाते समय जो मंशा थी उसमें कामयाबी मिली। जो दूरगामी सोच थी वह फली लेकिन कहीं न कहीं कोई न कोई कमी महसूस होती है। 59 साल की उम्र तक आते-आते जब इंसान परिपक्व हो जाता है तो फिर संविधान की आशा के अनुरूप हमारा देश क्यों नहीं हुआ? लाख टके का सवाल यही है कि खेती और गांव पर आधारित इस देश ने अगर हर क्षेत्र में तरक्की की तो फिर राजनीति के क्षेत्र में इतनी गिरावट क्यों? यहां से कड़वाहट मिलेगी इसका एहसास न तो संविधान निर्माताओं को रहा होगा और न ही आजादी के बाद पैदा होने वाली आबादी को हो रहा है पर कड़वा सच यही है कि राजनीतिक मूल्यों में जो गिरावट आयी उसने कहीं न कहीं हमारी ऐतिहासिक परंपरा को ठेस पहुंचायी है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। न इस क्षेत्र में लंबी पारी खेलने वाले और न ही अपनी बारी का इंतजार करने वाले। आजादी और संविधान निर्माण के वक्त का राजनीति का दौर देश सेवा का था लेकिन वक्त बीतते-बीतते इस धारा में ऐसा मैला बहा जिसने सारी गंगोत्री को चपेट में ले लिया। देश सेवा-जनसेवा का जज्बा खुद की सेवा में बदलने लगा। कुर्सी पाना आखिरी लक्ष्य हो गया। इसके लिए सारी जद्दोजहद होने लगी। राजनेता अपनी चाह की पूर्ति के लिए समाज को जाति, संप्रदाय, क्षेत्र और बोली के हिसाब से बांटने लगे। इसी आधार पर टिकट बांटने लगे। पार्टियां चलाने लगे। गद्दी के लिए बेमेल गठबंधन करने लगे। देश की तरक्की की बजाय अपनी तरक्की का गेम खेलने लगे। न उनकी देश सुधार की चाह झलकी, न राजनीतिक सुधार की। चुनाव सुधार की बात करना तो दूर की कौड़ी हो गयी। आए दिन कहीं न कहीं चुनाव होते रहे। पहुंच वाले टिकट पाते रहे। सदन में जाते रहे। जनादेश की मनमानी व्याख्या करते रहे। चुनाव के बाद के गठजोड़ जनादेश का मजाक उडाते रहे। देश पर क्या गुजरी, जनता पर क्या गुजरेगी किसी ने इसकी परवाह नहीं की। जनादेश की मर्जी के बिना राजपाट चलते रहे। सरकारें गिरती रहीं। एक दूसरे पर लांछन लगते रहे। हम देश पर गर्व करते रहे और वे देश की इज्जत उछालते रहे। धीरे-धीरे नेताओं की कथनी और करनी का अवमूल्यन होता गया। वे समझे या ना समझे पर हर देशवासी को यह जरूर कचोटता है कि हमें घूसखोर राष्ट्रों में गिना जाता है। हमारे नेता कम क्षमता वाले, जुबान के मीठे और दिल के काले माने जाते हैं। राजनेताओं और राजनीति के इस मायाजाल ने इस अरसे में सबसे ज्यादा पीड़ा जनता को पहुंचाई है। पर कहा किससे जाये? उम्मीद किससे की जाये? राजनेता राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर एक नहीं होते। मूल समस्याएं मुंह बाये खड़ी रहती हैं। लेकिन जब राजनीतिक और चुनाव सुधार की बात आती है तो चुप्पी साध जाते हैं। दिन- रात एक दूजे को कोसने वाले अपने फायदे के लिए एक मंच पर खड़े नजर आते हैं। नतीजा देश,जनता और हमारा संविधान ठगा सा महसूस करता आ रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्यों दागी, घूसखोर, बलात्कारी, हत्यारे जनसेवक बन जाते हैं? आखिर क्यों जनसेवक के लिए कोई शैक्षिक योग्यता तय नहीं की जाती? इस क्यों का जवाब न तो कोई दल देता हैऔर न ही इसका उत्तर संविधान के जरिए वो सामने आने देते हैं। देश की जनता के सामने एक अबूझ पहेली यह भी है कि जिस समय संविधान बनाया गया था, आबादी 35 करोड़ थी तब हमारी लोकसभा की सीटें उतनी ही थी आज जब हम एक अरब पार कर गए हैं तब तक वो उतनी ही हैं। परिसीमन से क्षेत्र जरूर बदले हैं पर संख्या नहीं। संविधान के 82 वे संशोधन के तहत 2026 तक ये रहेंगी इतनी। ऐसे में यह कैसे मान लिया जाए कि जनता का सही प्रतिनिधित्व हमारे सामने है? अगर ऐसा नहीं है तो संविधान की असली चाह पूरी होने की बात कैसे गले उतर सकती है? आज हमें यह सोचने और करने की जरूरत है कि सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश किस तरह सबसे अच्छा लोकतांत्रिक देश बने-गणतंत्र दिवस की असली चाह हमारी तभी पूरी होगी। हर शख्स यही चाहता है पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारे राजनेता चाहते हैं? (26.1.09)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें