देशपाल सिंह पंवार
खुदा का शुक्र है पहली बार कम से कम पाकिस्तान ने ये तो कबूल किया कि मुंबई पर हमले की साजिश उसकी धरती पर रची गई। कसब समेत 9 आतंकवादियों के खिलाफ मामले दर्ज करने तथा छह को पकड़ने का ऐलान किया। साथ ही यह कहना कि मदद आतंकियों को हिंदुस्तान से ही मिली-पाकिस्तान के नापाक बोल की पोल खोल रहा है। सब जानते हैं कि हमारे खिलाफ पाक के इरादे हमेशा ही नापाक रहे हैं। बंटवारे के बाद से ही खून की होली खेलने की साजिशें उस धरती से रची जाती रहीं। धमाके होते रहे। बेगुनाह लोग मरते रहे। हर हमले के बाद हिंदुस्तान कहता गया कि पाकिस्तान का हाथ है लेकिन न उस हाथ ने माना और न ही हम उस हाथ को रोक पाए,तोड़ पाना तो दूर की बात है। हां टोका-टाकी चलती रही। बात होती रही। खून बहता रहा। सिलसिला मुंबई तक पहुंच गया। 26 नवंबर को यहां हमला हुआ। सारी दुनिया ने लाइव देखा। मारने वाले हाथ कौन थे? मरने वाले कौन थे? सपनों की नगरी में आतंक मचाने वालों के पीछे किस देश का हाथ था? जनता व्याकुल थी। क्रोधित थी। राजनेताओं के प्रति जहर उगल रही थी। हालात खराब थे। पाकिस्तान का हाथ है,सरकार चिल्लाती आ रही थी,रोजाना दबाव बढ़ाती जा रही थी। धमकी खोखली साबित होती जा रही थी। सारे सबूतों के बावजूद बेशर्मी से पाकिस्तान सरकार इंकार करती जा रही थी। टालती जा रही थी। सारे दोष हिंदुस्तान पर ही डालती जा रही थी। दुनिया खामोशी से देखती जा रही थी। वक्त की सुईं बढ़ती जा रही थी। हमारी उम्मीद टूटती जा रही थी। आखिरकार ऐसा क्या हुआ कि जिस देश ने सपने तक में सच की राह पर जाने की ना सोची हो,एक कदम ना बढ़ाया हो वो अचानक ऐसी वाणी कैसे बोलने लगा? इस वाणी के पीछे का सच क्या है? हिंदुस्तान इस कामयाबी पर खुश हो सकता है। जनता मान सकती है कि पाकिस्तान को झुकना पड़ा लेकिन जिस अंदाज में जो बोल उस धरती से बोले गए हैं वो जश्न मनाने वाला सच नहीं बल्कि कड़वा सच यह है कि उसकी फितरती ये चाल और फरेबी ये बोल आने वाले समय में हिंदुस्तान की राजनीति और देश के सामाजिक परिवेश में गुंजते रहेंगे। सारी परिस्थिति पर अगर निगाह डाली जाए तो हिंदुस्तान इस खुशफहमी में नहीं रह सकता कि यह पाक का झुकना है या यह हमारे दबाव का यह प्रतिफल है। सारी दुनिया के सच देखने और निंदा करने के बावजूद पाकिस्तान इस बात पर अड़ा रहा कि कसब ना तो उनके देश का है। ना उसके यहां आतंकवादी हैं, ना कैंप चलते हैं। किसी तरह वो इस बात तक आया कि वो किसी आतंकवादी को नहीं सौंपेगा। मुकदमे पाकिस्तानी कानून के तहत अपने देश में ही चलायेगा। नीयत में खोट इसी से झलकता है कि वो बार-बार हिंदुस्तान से सबूत मांगता रहा और साथ ही साथ ये दुहाई देता रहा कि सबूतों में दम नहीं है। ऐसी हालत में जांच पूरी करना और उसे अंजाम तक पहुंचाने की बात करता रहा। हिंदुस्तान ने सारे हथकंडों को आजमाया पर वो घिसी पिटी बातें करके वक्त निकालता रहा। जवाब देने की बातें चलती रहीं। यह सिलसिला यूं ही चलता अगर दुनिया के बिग बास का रूझान हमारी ओर नहीं झलकता। बराक ओबामा की ओर से सहायता में कटौती की बात नहीं की जाती। ओबामा की इस वाणी ने ही पाकिस्तान की बोलती बंद की कि आतंकवाद उसी की धरती से पनप रहा है। जिसे अमरीका हर हालत में कुचलेगा। जिसके दम पर पाकिस्तान चलता आ रहा था। गुर्राता आ रहा था जब उसी साहूकार की ओर आंख दिखायी गयी तब जाकर पाकिस्तान को ये एहसास हुआ कि पानी सिर से गुजर रहा है। इस राह पर आना उसकी मजबूरी बन गया था लेकिन अपनी परंपराओं और कुटिल सोच का उसने फिर परिचय दिया। हमारे वित्त मंत्री द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री पर निशाना साधने के ठीक अगले दिन उसने यह बात मानी कि साजिश पाकिस्तान की धरती पर रची गई लेकिन मदद हमारी ओर से मिली। यानि हिंदुस्तान के कुछ लोग इस साजिश में शामिल हैं। जिस अंदाज में उसने आतंकियों के समुद्री रास्ते से मुंबई में घुसने और सात सिम यहां से रिलीज होने की बात कही उससे इस दुश्मन पड़ोसी के कुटिल खेल का इरादा साफ झलकता है। बहुत खूबसूरती से तीस सवाल दागकर उसने गेंद उठाकर हमारे पाले में डाल दी है। नफे-नुकसान का अंदाजा लगाकर ही उसने यह कदम उठाया है। हां हमारी सरकार को इससे काफी समझदारी से निपटना होगा। अगर वह पाकिस्तान के दावे से इंकार करती है तो फिर इंटरनेशनल बिरादरी की हमदर्दी बटोरने में वो कामयाब हो जायेगा। साथ ही यह समझाने में सफल रहेगा कि पड़ौसी यूं ही बेबुनियाद आरोप लगाता रहता है। अगर हिंदुस्तान जांच को तैयार होता है तो समय तो जाया होगा ही इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वह इस जांच को मान ही लेगा। साथ ही अगर जांच का रुख राजनीति की ओर मुड़ गया तो स्थिति और बिगड़ सकती है। आम चुनाव सिर पर हैं। देश के हालात मंदी और कई मुद्दों की वजह से ज्यादा बेहतर नहीं हैं। इस घिनौनी चाल पर सरकार को काफी सही कदम उठाने होंगे। जो हो पाक ने यह जरूर दिखा दिया कि उसकी घिनौनी सोच में तब्दीली नहीं हुई है। (13.2.09)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें