
देशपाल सिंह पंवार
उन्हें सब नेताजी कहते हैं। पार्टी वाले भी और विरोधी दल वाले भी ,शिक्षक थे। पढ़ाई से ज्यादा राजनीति में रम गए। समाजवादी बन गए। लोहिया जी की सेवा करते-करते चौधरी चरण सिंह के कथित दत्तक पुत्र कहलाने लगे। खुद को वारिस जताने लगे। चरण सिंह बिस्तर पकड़ गए। अजित सिंह अमरीका से लौट आए तो नेताजी मुंह बनाकर घर में बैठ गए। यूपी में सरकार बनाने की बारी आई । वीपी सिंह चले थे अजित को गद्दी सौंपने पर उनके दूत लखनऊ तक पहुंचते-पहुंचते नेताजी के हो गए। अजित देखते रह गए -नेताजी मुख्यमंत्री बन गए- जाट बिदक गए। गद्दी पर बैठते ही तन गए। जिनके रहमोकरम पर थे उनसे ही ठन गए। तब तक नेताजी वास्तव में नेताजी बन गए थे। समझ गए थे कि दलित मायावती के साथ हैं। अगड़े हिंदू बीजेपी के साथ हैं। जाट अजित के साथ हैं और अन्य पिछड़े कांग्रेस के साथ। नेताजी अल्पसंख्यकों के हो गए और अल्पसंख्यक उनके। इसी थ्योरी की नेताजी ने अब तक फसल काटी। तीन बार सीएम बने। दूसरी बार के राजपाट में पत्रकारों के चहेते बने। खजाने का मुंह खोला। जिसने जितना मुंह खोला। उतना धन अंदर। बस गुणगान करते चलो। लखनऊ या दिल्ली का एक से एक दिग्गज पत्रकार बहती गंगा में हाथ धोता रहा। सबके चेहरे नंगे हैं। हां यह बात दीगर है कि सब चंगे हैं। मामला अब तक नहीं निपटा है। हाथी की मालकिन पर गेस्ट हाउस में हमला करवाया। नतीजा राजनीति उम्मीद का खेल है की थ्योरी को यहां से पिटकर वापस लौटना पड़ता है। नेताजी ने अफसरशाही तक को साइकिल पर बैठाया। जो नहीं बैठा उसे गद्दी से गिराया। ऐसे में उन्हें हाथी की सवारी की बारी मिलने लगी। अफसरशाही आज इस प्रदेश में साफ-साफ इन दो दलों की फौज की तरह नजर आती है। सबके दामन पर दाग लग चुके हैं पर दूसरे की कमीज पर कीचड़ उछालने का खेल जारी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछली सदी तक नेताजी कर्म से भी समाजवादी थे और धर्म से भी, 21 वीं सदी आई-अमर का सहारा मिला। ऐसा गुल खिला कि नेताओं के संग से ज्यादा फिल्मी दुनिया में मन रमने लगा। सुपर स्टार से लेकर जयाप्रदा तक सब पर नेताजी का हाथ और सब हरदम उनके साथ। चारों ओर ग्लैमर। सरस्वती के सेवक पर मां लक्ष्मी ने खूब प्यार लुटाया। हां अब ढेरों मामले जरूर परेशान करते रहते हैं। इसके लिए नेताजी दांव खेलते रहते हैं। नेताजी की एक और खासियत है-वे कल,आज और कल की राह पर चलते हैं। कल जिससे दोस्ती,आज दुश्मनी, कल फिर दोस्ती। अजित, कल्याण, कांग्रेस, लालू, पासवान आदि से कभी पंगा तो कभी मन चंगा। बस माया को छोड़कर। वो मोह माया में नहीं पड़ते। यह बात दीगर है कि उनके चारों तरफ इसी का राज है। इस बार लालू, पासवान, कल्याण की तिकड़ी कल्याण कराएगी या उनकी राजनीति की ऐंठ मुलायम पड़ेगी यह देखने की बात होगी। वैसे वे आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं। एक बात नेताजी की बहुत अच्छी है वे जिसका साथ देते हैं हमेशा देते हैं खूब देते हैं।
मुलायम सिंह यादव
0-22 नवंबर ,1939 को सैफई( इटावा ) में अहीर किसान परिवार में जन्म। मैनपुरी में इंटर तक की पढ़ाई। आगरा विवि से एम और बीटी। अखिलेश यादव और प्रतीक यादव दो पुत्र। शिक्षक से राजनीति में। समाजवादी चेहरा। राममनोहर लोहिया के शिष्य और चौधरी चरण सिंह के अनुयायी। 1977 में पहली बार राज्य मंत्री। 80 में लोकदल के यूपी अध्यक्ष। 82 में उच्चसदन में विपक्ष के नेता। 89 में बीजेपी के सहयोग से पहली बार मुख्यमंत्री। अजित सिंह की हार। अयोध्या मसले पर बीजेपी से टकराव। आडवाणी की रथयात्रा का विरोध। यूपी में न घुसने देने का एलान। समर्थन वापस। 90 में वीपी सरकार के पतन के बाद चंद्रशेखर के साथ। कांग्रेस के समर्थन से राज जारी। 91 में केंद्र सरकार गिरी। मुलायम से कांग्रेस ने पल्ला झाड़ा। मध्यावधि चुनाव। कल्याण सत्ता में। दिसंबर में विवादित ढांचा धराशाई। देश में हिंसा। अक्टूबर 92 में समाजवादी पार्टी( सोशलिस्ट पार्टी) गठित। 93 में बसपा के साथ राज्य में चुनाव लड़ा। बसपा, कांग्रेस और जनता दल के समर्थन से दूसरी बार सीएम। मुजफ्फरनगर में 94 में उत्तराखंडियों पर फायरिंग। 95 में समर्थन वापस। सरकार का पतन। मैनपुरी से 96 में संसद में। सयुंक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री। लालू की वजह से पीएम नहीं बन पाए। 98 में देवेगौड़ा सरकार का पतन। फिर चुनाव। सांसद। मायावती से छत्तीस का आंकड़ा। बीजेपी -बसपा नजदीक। फिर झगड़ा। बसपा को तोड़ा। अमर सिंह का साथ। निर्दलीयों के समर्थन से तीसरी बार 2003 में सीएम। इसी गद्दी पर रहते मैनपुरी से फिर सांसद। सपा ने सबसे ज्यादा 42 सीटें जीतीं। यूपीए को समर्थन। 07 में हाथी ने साइकिल को तोड़ डाला। लगातार विवादों में। सरकारी खजाने को लुटाने के आरोप। सैफई में स्टेडियम से लेकर कालेज तक। 7 स्टार होटलों से ज्यादा सुविधाएं। अरबों रूपये की संपत्ति खड़ी करने का आरोप। सीबीआई केस। सुप्रीम कोर्ट में मामला। ढेरों समाजवादी चेहरे पार्टी से अलग। अल्पसंख्यकों में गहरी पकड़। 2008 में मनमोहन सरकार को बचाया। कल्याण से हाथ मिलाने के बाद गड़बड़। अब लालू-पासवान संग मोरचा बनाया। प्रतिष्ठा दांव पर।
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