
देशपाल सिंह पंवार
वो बचपन से ही ऐसी है-गलत बात पर हाथ छोड़ने वाली। नाम के ठीक विपरीत। वो गरीबों पर अत्याचार सहन नहीं कर सकती। वो कदापि ये नहीं देख सकती कि कोई उसे औरत समझकर हल्के में ले। जिसने ऐसी गलती की मार खाई। जमकर मार खाई-अकेले मे भी और जमघट में भी,उसे कोई नहीं भूल सकता। वे भी जिन्होंने बचपन से जवानी तक उसके हाथ से मार खाई। वे भी जो संसद के गलियारों तक में उसके हाथों पिटे। वे भी जिनके कालर उसके हाथ में थे और जुबान से गालियों की बौछार बह रही थी। वे भी जिनके साथ उसने राजनीति की। सोम दा जिन्हें हराकर वे सांसद बनीं। राव भी जिनके कैबिनेट में वो मंत्री थी लेकिन कोलकाता में सरकार के खिलाफ वे रैली निकाल रही थी। सोनिया भी -जिन्हें टका सा जवाब देकर वे अलग पार्टी बनाकर खड़ी हो गई थी। पासवान भी जिन्हें संसद में ही उन्होंने खरी-खोटी सुनाई थी। वाजपेयी भी जिन्हें राम-राम कहकर वे कांग्रेस से मिल गई थीं। उन्हें बंगाल सरकार खासकर बुद्धदेव तो कभी नहीं भूल सकते। जिनकी बार-बार हजार बार उसने नंदीग्राम और वहां से दुनिया में किरकिरी कराई। उसे वो भी नहीं भूल सकते जो उसकी राजनीति की वजह से पुलिस से मार खाते रहे। उसे नंदीग्राम और सिंगूर से जुड़े वो परिवार कभी नहीं भूल सकते जिनके परिजन आंदोलन की चपेट में चढ़ गए। अल्लाह को प्यारे हो गए। चाहे एक बार ऐसा कुछ हो कि सब भूल जाएँ पर एक शख्स ऐसा है जो किसी भी सूरत में नहीं भूल सकता और वो है टाटा। चाहे सारा देश नैनो का दीवाना हो। हर कोई उसे देखना और उसकी सवारी करना चाहता हो पर बंगाल की इस शेरनी का अगर बस चले तो उसे अरब सागर में डुबो दे। उसके नाम को सारी दुनिया जानती है। सब यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि आज के राजनेताओं की तरह मुंह में राम-बगल में छुरी लेकर वो नहीं चलती। आज के राजनेताओं की भूख नहीं मिटती और उसे भूख नहीं लगती। राजनीति के सहारे उसने दौलत नहीं कमाई। उसकी कमाई यही है कि वो गरीबों की जंग लड़ती है। मुंहफट और जिद्दी स्वभावः उसकी कमजोरी नहीं बल्कि ताकत है। यह उस जनता की भी ताकत है जो उसके पीछे खड़ी है। इतिहास गवाह है कि बंगाल में लाल सलाम की ज्यादती का कोई मुकाबला नहीं कर पाया। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस भी नहीं। ढेरों बंगाली कांग्रेसी नेता दिल्ली में जैसे बोलते दिखते हैं कोलकाता में उतरते ही लाल सलाम को सलामी ठोंकते नजर आते हैं। इसके ठीक विपरीत वो दिल्ली में भले ही शांत रहती हों पर बंगाल की धरती पर उसकी दहाड़ लाल सलाम की बोलती बंद कर देती है। जिस दिन उसके हाथ में देश की कमान होगी यकीनन उस दिन जनता का असली राज होगा। गरीब की आवाज का मोल होगा। पर क्या कभी ऐसा होगा-फिलहाल तो इस चुनाव पर सब कुछ टिका है?
ममता बनर्जी
0 कोलकाता में 5 जनवरी 1955 को जन्म। बसंती देवी कालेज से स्नातक। जोगेश चौधरी ला कालेज से एलएलबी। अमरीका से पीएचडी। 1970 में कांग्रेस में प्रवेश। तेज तर्रार तेवर और युवा होने की वजह से जल्दी ही पहचान। 84 में जादवपुर सीट से सांसद निर्वाचित। सोमनाथ दा को पराजित। युवक कांग्रेस की महासचिव। 89 में पराजित। 91 में कोलकाता दक्षिण सीट से फिर सांसद। 96,98, 99 और 2004 में फिर इसी सीट से निर्वाचित। 91 में राव सरकार में पहली बार केंद्रीय मंत्री। मानव संसाधन, खेल व महिला व बालकल्याण की राज्य मंत्री। सरकार की नीतियों के खिलाफ खेल मंत्री के रूप में कोलकाता में विरोध रैली। 93 में पद छिन गए। 96 में कांग्रेस पर वामदलों के सामने घुटने टेकने का आरोप। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ाने का संसद में विरोध। अमर सिंह के कालर पर हाथ डाला। 97 में रेलमंत्री रामविलास पासवान पर पश्चिम बंगाल की उपेक्षा पर काला शाल संसद में फैंका। इस्तीफा देने का एलान। संतोष मोहन देव की वजह से मामला निबटा। 97 में तृणमूल कांग्रेस गठित। बंगाल में वाम सरकार का विरोध। महिला आरक्षण बिल का विरोध करने पर 11 दिसंबर 98 को सपा सांसद दरोगा प्रसाद सरोज का कालर पकड़कर संसद की लाबी में घसीटा। 99 में अटल सरकार में रेल मंत्री । 2000 में पहली बार रेलबजट पेश । बंगाल के लिए कई योजनाएं। टूरिज्म की ओर रेलवे को मोड़ा। इंडियन रेलवे कैटरिंग और टूरिज्म कारपोरेशन लिमिटेड बनाने का प्रस्ताव। नेपाल और बांग्लादेश तक चलने वाली ट्राँस एशियन रेलवे चलाने का एलान। 19 नई ट्रेन चलाने का फैसला। 2001 में बीजेपी से खटपट। एनडीए से नाता तोड़ा। 2001 में बंगाल चुनाव में कांग्रेस से गठजोड़। 2004 में फिर एनडीए सरकार में कोयला मंत्री के रूप में वापसी। दल की अकेली सांसद। 06 में फिर संसद से इस्तीफा देने का एलान। बंगाल सरकार की औद्योगिक नीति का खुला विरोध। विधानसभा में जमकर तोड़फोड़। नंदीगा्रम में औद्योगिक हब बनाने पर हिंसा। जमीन अमीरों को देने का खुला विरोध। लगातार हिंसा। सिंगुर में हिंसा। टाटा के नैनो प्लांट पर ताला। स्टेट छोड़कर जाना पड़ा। इस बार फिर सबकी नजर ममता पर।
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