
देशपाल सिंह पंवार
यूं तो लाल झंडा संघर्ष का ही प्रतीक है। ज्यादातर कामरेड जीवन में तपकर ही ऊपर तक पहुंचे। यह शख्स भी इसी धारा से बहकर इस शिखर तक पहुंचा है। रंगून में जन्मा। बचपन से ही सारे दुख झेले। जीवन के इन्हीं थपेड़ों ने लड़ाकू बना दिया। हां पढ़ाकू ज्यादा था। स्कोलरशिप के सहारे ब्रिटेन तक पढ़ाई की पर सोच से कम्युनिस्ट था बस बनना बाकी था। ऐसा ही एक प्रोफेसर क्या मिला वही राह पकड़ ली। 70 में जेएनयू कैंपस में डेरा जमते ही पक्का कामरेड बन गया। विवि में कम्युनिस्ट रंग जमाने लगा। ऐसे ही छात्र साथी मिलने लगे। जीवन साथी तक इसी रंग से जिंदगी में आ गई फिर क्या था देश-दुनिया में जहां शोषण की बात होती तो यह शख्स पार्टी लाइन का बिगुल बजाने लगा। एक से एक कामरेड माकपा में थे। लगता नहीं था कि बहुत जल्दी ये जवान कामरेड ऊपर की ओर बढ़ने लगेगा लेकिन सिद्धांतों की कीमत पर समझौता न करने और हर समय आंदोलन में कूदने और उसे सफल बनाने की खूबी की वजह से जल्दी ही रास्ते खुलने लगे। पुरानी पीढ़ी के बीच नजर आने वाले कुछ जवान चेहरों में से एक वह था। सांसद बन गया। 57 साल की उम्र में माकपा का महासचिव बना। लाल सलाम का सबसे ताकतवर चेहरा। पार्टी लाइन बदलने की ओर। हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु और सोमनाथ दा जैसों के बीच इस शीर्ष पर पहुंचने से खुद कामरेड भी हैरत में थे। लेकिन यही सच था। चाहे ढेरों कामरेड इसे लामबंदी का नतीजा मानते रहे हों पर यह सच है कि यह चेहरा जल्दी ही सबको अच्छा लगने लगा था। यह भी सच है कि लामबंदी की कमाई इस कामरेड ने बहुत खाई है। हमेशा सत्ता विरोध की राजनीति करने वालों को सत्ता के नजदीक ले जाने और इसकी कीमत वसूलने वालों में सीताराम येचूरी के अलावा इस कामरेड को भी अग्रणी माना जाता है। यूपीए सरकार को समर्थन बाहर से और कीमत अंदर से। हैरत की बात यह भी है कि जनहित से जुड़े मुद्दों के लिए लड़ना पार्टी की भी पहचान है और इस शख्स की भी लेकिन यूपीए सरकार फैसले करती गई और लाल सलाम के ये खासोआम सिर्फ बयानबाजी या धमकियों में ही उलझे रहे। कर्मचारियों के खिलाफ, जनहित के खिलाफ कठोर फैसलों पर केवल इन कामरेड़ों की तरफ से बस बयानबाजी ही जनता और इस विचारधारा को नसीब हो पाई। परमाणु करार पर कठोर फैसला जरूर किया लेकिन सत्ता की चाश्नी का नशा ऐसा है कि छूट नहीं रहा है। देश को अपने हिसाब से हांकने की सोच के चलते लगातार गठजोड़ या जुगाड़ में लगे रहते हैं। कांग्रेस और बीजेपी को सबक सिखाने के लिए तीसरा मोरचा बना रहे हैंं। सबके घर दस्तक देते घूम रहे हैं। पर इस पढ़े-लिखे कामरेड को क्या राजनीति की ये एबीसीडी समझ में नहीं आती कि इस देश में बीजेपी व कांग्रेस के बिना फिलहाल केंद्र में कोई सरकार बनने के आसार नहीं हैं। एक का साथ या एक के साथ के बिना कैसे केंद्र में सरकार बनेगी अगर इस कामरेड को यह पता है तो सब जानना चाहते हैं कि कैसे? इस कोशिश का मकसद यही माना जा रहा है कि केंद्र में उनकी सरकार चाहे ना आए पर उनके इशारे पर चले जरूर। सोमनाथ दा जैसे दिग्गज की बलि लेने वाले इस कामरेड के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का सवाल है। फिलहाल कोई कामरेड चाहे सामने न बोलता हो पर अगर इस बार पिटे तो सोमनाथ इश्यू फिर गरमा सकता है। सोमनाथ मान सकते हैं। घर बैठ सकते हैं पर उनके समर्थकों के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं। अनुशासन की धार कुंद पड़ सकता है । यह ये कामरेड भी जानता है जो सबको चला रहा है। उनका चेहरा संघर्ष का प्रतीक कम और चिंतक का ज्यादा नजर आता है। वास्तव में वे इस समय चिंता में है। दर-दर धक्के खा रहे हैं। देखना है कि सत्ता का स्वाद मिलता है या गुलशन बरबाद होता है।
प्रकाश करात
0-7 फरवरी,1948 को रंगून (बर्मा) में जन्म। पिता ब्रिटिश रेलवे के कर्मचारी। मूलत केरल के इल्लाप्पूलै में जड़ें। स्कूली शिक्षा के दौरान ही पिता की मौत। कष्टमय जीवन। बहन कमला और माता राधा के साथ मद्रास में डेरा। बहन का भी निधन। मां जीवन बीमा निगम की एजेंट। मद्रास क्रिश्चियन कालेज से शिक्षा। स्नातक शिक्षा में गोल्ड मेडल। स्कोलरशिप। एडिनबर्ग विवि में राजनीतिक शास्त्र की स्नातकोत्तर की पढ़ाई। प्रो विक्टर कीरनन की संगत। मार्क्सवादी सोच धीरे-धीरे विकसित। आंदोलन का हिस्सा। विवि से बर्खास्त। अच्छे व्यवहार के कारण फिर से विवि में। 1970 में देश वापसी। जेएनयू में । माकपा की एस एफ आई के विवि में जन्मदाता। जमकर छात्र राजनीति। 1974 में पहले छात्र यूनियन अध्यक्ष। 79 तक इस पद पर। माकपाई वृंदा करात से 75 में शादी। दोनों माकपा के कार्यकर्ता। पार्टी के लिए जीवन भर बच्चा पैदा न करने का फैसला। आपातकाल में भूमिगत दो बार गिरफ्तार। 8 दिन जेल में। माकपा के दिग्गज ए के गोपालन के साथी के रूप में कार्य करने लगे। 85 में माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य। 92 में पोलित ब्यूरो में। माकपाई मुखपत्र दी मार्कसिस्ट के संपादकीय बोर्ड में। 2005 में हरिकिशन सिंह सुरजीत के स्थान पर माकपा के जनरल सेक्रे टरी। पार्टी कैडर का सर्वाधिक पावरफुल पद। यंग जनरेशन के हाथ में पार्टी। ज्योति बसु, सुरजीत युग का अंत। सीताराम येचूरी के साथ अच्छा जोड़ा। पत्नी तक आगे बढ़तीं गईं। लेफ्टवर्ल्ड के एमडी। 72, 99 और 2003 में तीन किताबें लिखीं। 2004 में यूपीए सरकार का गठन। बाहर से वामदलों का समर्थन। लगातार सरकार पर दबाव। मुंह में लड्डू और हाथ से आंदोलन की बात। 2008 में अमरीका से परमाणु करार पर सरकार से समर्थन वापस। सोमनाथ दा सरकार के साथ। पार्टी से बाहर निकाला। तीसरा मोरचा बनाने में जुटे। इस बार संसदीय चुनाव में प्रतिष्ठा दांव पर।
यूं तो लाल झंडा संघर्ष का ही प्रतीक है। ज्यादातर कामरेड जीवन में तपकर ही ऊपर तक पहुंचे। यह शख्स भी इसी धारा से बहकर इस शिखर तक पहुंचा है। रंगून में जन्मा। बचपन से ही सारे दुख झेले। जीवन के इन्हीं थपेड़ों ने लड़ाकू बना दिया। हां पढ़ाकू ज्यादा था। स्कोलरशिप के सहारे ब्रिटेन तक पढ़ाई की पर सोच से कम्युनिस्ट था बस बनना बाकी था। ऐसा ही एक प्रोफेसर क्या मिला वही राह पकड़ ली। 70 में जेएनयू कैंपस में डेरा जमते ही पक्का कामरेड बन गया। विवि में कम्युनिस्ट रंग जमाने लगा। ऐसे ही छात्र साथी मिलने लगे। जीवन साथी तक इसी रंग से जिंदगी में आ गई फिर क्या था देश-दुनिया में जहां शोषण की बात होती तो यह शख्स पार्टी लाइन का बिगुल बजाने लगा। एक से एक कामरेड माकपा में थे। लगता नहीं था कि बहुत जल्दी ये जवान कामरेड ऊपर की ओर बढ़ने लगेगा लेकिन सिद्धांतों की कीमत पर समझौता न करने और हर समय आंदोलन में कूदने और उसे सफल बनाने की खूबी की वजह से जल्दी ही रास्ते खुलने लगे। पुरानी पीढ़ी के बीच नजर आने वाले कुछ जवान चेहरों में से एक वह था। सांसद बन गया। 57 साल की उम्र में माकपा का महासचिव बना। लाल सलाम का सबसे ताकतवर चेहरा। पार्टी लाइन बदलने की ओर। हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु और सोमनाथ दा जैसों के बीच इस शीर्ष पर पहुंचने से खुद कामरेड भी हैरत में थे। लेकिन यही सच था। चाहे ढेरों कामरेड इसे लामबंदी का नतीजा मानते रहे हों पर यह सच है कि यह चेहरा जल्दी ही सबको अच्छा लगने लगा था। यह भी सच है कि लामबंदी की कमाई इस कामरेड ने बहुत खाई है। हमेशा सत्ता विरोध की राजनीति करने वालों को सत्ता के नजदीक ले जाने और इसकी कीमत वसूलने वालों में सीताराम येचूरी के अलावा इस कामरेड को भी अग्रणी माना जाता है। यूपीए सरकार को समर्थन बाहर से और कीमत अंदर से। हैरत की बात यह भी है कि जनहित से जुड़े मुद्दों के लिए लड़ना पार्टी की भी पहचान है और इस शख्स की भी लेकिन यूपीए सरकार फैसले करती गई और लाल सलाम के ये खासोआम सिर्फ बयानबाजी या धमकियों में ही उलझे रहे। कर्मचारियों के खिलाफ, जनहित के खिलाफ कठोर फैसलों पर केवल इन कामरेड़ों की तरफ से बस बयानबाजी ही जनता और इस विचारधारा को नसीब हो पाई। परमाणु करार पर कठोर फैसला जरूर किया लेकिन सत्ता की चाश्नी का नशा ऐसा है कि छूट नहीं रहा है। देश को अपने हिसाब से हांकने की सोच के चलते लगातार गठजोड़ या जुगाड़ में लगे रहते हैं। कांग्रेस और बीजेपी को सबक सिखाने के लिए तीसरा मोरचा बना रहे हैंं। सबके घर दस्तक देते घूम रहे हैं। पर इस पढ़े-लिखे कामरेड को क्या राजनीति की ये एबीसीडी समझ में नहीं आती कि इस देश में बीजेपी व कांग्रेस के बिना फिलहाल केंद्र में कोई सरकार बनने के आसार नहीं हैं। एक का साथ या एक के साथ के बिना कैसे केंद्र में सरकार बनेगी अगर इस कामरेड को यह पता है तो सब जानना चाहते हैं कि कैसे? इस कोशिश का मकसद यही माना जा रहा है कि केंद्र में उनकी सरकार चाहे ना आए पर उनके इशारे पर चले जरूर। सोमनाथ दा जैसे दिग्गज की बलि लेने वाले इस कामरेड के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का सवाल है। फिलहाल कोई कामरेड चाहे सामने न बोलता हो पर अगर इस बार पिटे तो सोमनाथ इश्यू फिर गरमा सकता है। सोमनाथ मान सकते हैं। घर बैठ सकते हैं पर उनके समर्थकों के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं। अनुशासन की धार कुंद पड़ सकता है । यह ये कामरेड भी जानता है जो सबको चला रहा है। उनका चेहरा संघर्ष का प्रतीक कम और चिंतक का ज्यादा नजर आता है। वास्तव में वे इस समय चिंता में है। दर-दर धक्के खा रहे हैं। देखना है कि सत्ता का स्वाद मिलता है या गुलशन बरबाद होता है।
प्रकाश करात
0-7 फरवरी,1948 को रंगून (बर्मा) में जन्म। पिता ब्रिटिश रेलवे के कर्मचारी। मूलत केरल के इल्लाप्पूलै में जड़ें। स्कूली शिक्षा के दौरान ही पिता की मौत। कष्टमय जीवन। बहन कमला और माता राधा के साथ मद्रास में डेरा। बहन का भी निधन। मां जीवन बीमा निगम की एजेंट। मद्रास क्रिश्चियन कालेज से शिक्षा। स्नातक शिक्षा में गोल्ड मेडल। स्कोलरशिप। एडिनबर्ग विवि में राजनीतिक शास्त्र की स्नातकोत्तर की पढ़ाई। प्रो विक्टर कीरनन की संगत। मार्क्सवादी सोच धीरे-धीरे विकसित। आंदोलन का हिस्सा। विवि से बर्खास्त। अच्छे व्यवहार के कारण फिर से विवि में। 1970 में देश वापसी। जेएनयू में । माकपा की एस एफ आई के विवि में जन्मदाता। जमकर छात्र राजनीति। 1974 में पहले छात्र यूनियन अध्यक्ष। 79 तक इस पद पर। माकपाई वृंदा करात से 75 में शादी। दोनों माकपा के कार्यकर्ता। पार्टी के लिए जीवन भर बच्चा पैदा न करने का फैसला। आपातकाल में भूमिगत दो बार गिरफ्तार। 8 दिन जेल में। माकपा के दिग्गज ए के गोपालन के साथी के रूप में कार्य करने लगे। 85 में माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य। 92 में पोलित ब्यूरो में। माकपाई मुखपत्र दी मार्कसिस्ट के संपादकीय बोर्ड में। 2005 में हरिकिशन सिंह सुरजीत के स्थान पर माकपा के जनरल सेक्रे टरी। पार्टी कैडर का सर्वाधिक पावरफुल पद। यंग जनरेशन के हाथ में पार्टी। ज्योति बसु, सुरजीत युग का अंत। सीताराम येचूरी के साथ अच्छा जोड़ा। पत्नी तक आगे बढ़तीं गईं। लेफ्टवर्ल्ड के एमडी। 72, 99 और 2003 में तीन किताबें लिखीं। 2004 में यूपीए सरकार का गठन। बाहर से वामदलों का समर्थन। लगातार सरकार पर दबाव। मुंह में लड्डू और हाथ से आंदोलन की बात। 2008 में अमरीका से परमाणु करार पर सरकार से समर्थन वापस। सोमनाथ दा सरकार के साथ। पार्टी से बाहर निकाला। तीसरा मोरचा बनाने में जुटे। इस बार संसदीय चुनाव में प्रतिष्ठा दांव पर।
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