
देशपाल सिंह पंवार
चार दौर का पोल हो चुका है पर केंद्र में किसकी बनेगी सरकार और कौन बनेगा बड़ा सरकार इस पर अटकलें तेज हैं। सब प्रधानमंत्री बनने और सरकार बनाने की लाइन में लगे हैं पर किसी भी दल या बड़े नेताओं के दावों में विश्वास कम और चमत्कार की आस ज्यादा झलक रही है। पिटारा 16 मई को खुलेगा। शनि महाराज किसी का हित करते नजर नहीं आ रहे हैं। विखंडित जनादेश की आशंका या कड़वे सच के डर से सारे दल बेचैन अंधी गलियों में चक्कर काटते नजर आ रहे हैं। चुनाव पूर्व के गठबंधन बेमायने नजर आ रहे हैं। दोस्तों के दुश्मनों को अपना बनाने में मरे जा रहे हैं। कौन किस तरफ जाएगा यह कहना मुश्किल है। कौन प्रधानमंत्री बनेगा यह कहना और भी मुश्किल है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे विकट स्थिति है। 20 साल पुराने इस मर्ज का इलाज बेहद मुश्किल दिखाई पड़ रहा है। पर राजनीति उम्मीद का मेल है। संख्या बल का खेल है। चला-चली की रेल है। कोई ना कोई सूरत जरूर निकलेगी। हां खंडित जनादेश की स्थिति में गठजोड़ की राजनीति जितना अहम रोल अदा करेगी उससे ज्यादा अहम भुमिका होगी राष्ट्रपति की-वे किसे सरकार बनाने का न्यौता देती हैं? क्या सबसे बड़े दल को? या चुनाव पूर्व बने गठजोड़ को (सबसे ज्यादा सीटें पाने पर) या फिर चुनाव बाद जोड़े गए कुनबे को? या फिर उनकी नजर में सबसे टिकाऊ गठजोड़ को। या फिर कोई नया इतिहास लिखा जाएगा। ऐसे हालात में राजनेताओं से ज्यादा मुश्किल हालात राष्ट्रपति के सामने हैं। प्रतिभा पाटिल क्या फैसला करेंगी ? इसके कयास तेज हो गए हैं। पांचवा दौर बाकी है पर राष्ट्रपति पहले से ही रास्ता ढंूढने को संविधान विशेषज्ञों से सलाह मश्विरे में जुट गई हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि वे क्या करेंगी? क्या वे आर वैंकटरमन की राह पर जाएंगी या फिर शंकरदयाल शर्मा की। के आर नारायणन की, या एपीजे कलाम की? इस पर सबकी नजर रहेगी। वोट देने वाली जनता की भी, वोट पाने वाले नेताओं की •भी, सारी दुनिया की •भी, क्या होगा? 1989 से पहले तक देश के जो •भी राष्ट्रपति रहे उन्हें ऐसे मुश्किल हालात का सामना नहीं करना पड़ा। कुछ अन्य अवसरों को छोड़कर जो चुनाव से कम जुड़े थे और सरकार गिरने व बनने से उनका ताल्लुक ज्यादा था। पर पहली बार 89 के चुनाव में जब किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला तो तत्कालीन राष्ट्रपति आर वैंकटरमन को पहली बार ऐसी स्थिति झेलनी पड़ी थी। संविधान खंगालना पड़ा था। कोशिश यही थी कि संविधान के अनुसार ही सरकार बने। राजीव गांधी की कप्तानी में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी थी पर बहुमत से काफी दूर थी। चुनाव पूर्व बना संयुक्त मोरचा सबसे ज्यादा सीटें हासिल किए हुए था। वैंकटरमन दुविधा में थे और उन्हें संविधान •भी दुविधा से नहीं निकाल पा रहा था। उनकी मुश्किलें आसान की थी राजीव गांधी ने। उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश करने से इनकार कर दिया। नतीजा राष्ट्रपति ने मोरचा नेता वीपी सिंह को सरकार बनाने का न्यौता दिया। संकट उस समय तो टल गया लेकिन विखंडित जनादेश व हंग प्राइममिनिस्टर की सरकार न तो चलनी थी और न चली। दो साल में फिर चुनाव हुए। 1996 में फिर यही स्थिति आई। बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में आगे थी। कांग्रेस गठजोड़ आस लगाए बैठा था साथ ही संयुक्त मोरचा भी,पर शंकरदयाल शर्मा ने अटलबिहारी वाजपेयी को आमंत्रित कर सबको आश्चर्य में डाल दिया था। यह एक ऐतिहासिक फैसला था। हां सरकार फ्लोर को फेस नहीं कर पाई। 13 दिन में ही गिर गई। पर इस फैसले को सबने सराहा। 1998 में यही स्थिति फिर आई। ज्यादा मुश्किल हालात के साथ। राष्ट्रपति थे के आर नारायणन। किसी को बहुमत नहीं मिला। बीजेपी फिर सबसे बड़े दल और चुनाव बाद बीजेपी गठजोड़ सीटों में कांग्रेस गठजोड़ से काफी आगे रहा। इसके बावजूद कांग्रेस •भी सरकार बनाने को आतुर थी। हां दावा पेश नहीं करना चाहती थी। वह चाहती थी कि राष्ट्रपति आमंत्रित करें। मुश्किल में राष्ट्रपति थे। पर उन्होंने ऐतिहासिक फैसला किया। वाजपेयी को बुलाया और कहा कि क्या वे सरकार बनाने, स्थिर सरकार देने और बहुमत साबित करने की स्थिति में हैं? राजग के सांसदों की सूची तलब हुई। 272 के जादुई आंकड़े से 8 दूर रहने के बावजूद उन्होंने वाजपेयी को सरकार बनाने का न्यौता दिया। तत्कालीन राष्ट्रपति को आश्वासन मिला था कि टीडीपी के 12 सांसद न्यूट्रल रहेंगे। राष्ट्रपति ने फिर सोनिया गांधी से गुप्तगू की। सोनिया ने साफ कर दिया था कि वे सरकार बनाने का दावा नहीं करेंगी हां उन्हें सरकार बनाने के लिए न्यौता दिया जाना चाहिए, क्योंकि उनके चुनाव पूर्व गठजोड़ ने ज्यादा सीटें जीती हैं। तब राष्ट्रपति के सामने दो ही रास्ते थे-सबसे बड़े दल के रूप में वाजपेयी को बुलाया जाए या चुनाव पूर्व बने गठजोड़ को मिली ज्यादा सीटों को आधार बनाया जाए। उन्होंने सबसे बड़े दल तथा चुनाव बाद सबसे बड़े गठजोड़ को न्यौता दिया। वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। सरकार कैसे 13 माह में गई- सब जानते हैं। पर इस फैसले को सबने सराहा। 2004 में एपीजे कलाम ने •भी विखंडित जनादेश को झेला। हां हालात 89 व 98 जैसे नहीं थे। यूपीए की सरकार बनने से पहले तक उन्होंने •भी काफी माथापच्ची की। कलाम ने चुनाव बाद बने गठजोड़ को तवज्जो दी। लाख टके का सवाल यही है कि इस बार क्या होगा? प्रतिभा पाटिल किस परंपरा का निर्वाह करेंगी? किस नजीर से देश का वजीर ऐ आजम चुनेंगी? देश में जिस तरह का माहौल था चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान ही यह साफ हो गया था कि ना तो यूपीए को बहुमत मिलने जा रहा है और ना ही एनडीए को। तीसरा मोर्चा •भी चाहे गैर कांग्रेसी और गैर बीजेपी सरकार बनाने का बिगुल बजाए पर उसका राग बेसुरा ही होगा। उसके इस राग के पीछे एक मजबूत तर्क सिर्फ इतना है कि जब-जब खंडित जनादेश आया है तो देश में खिचड़ी सरकार पकी है। इस बार भी वह इसी आस में उछलकूद रहा है। चौथा मोर्चा बस अपनी स्थिति को मजबूत करने में जुटा था। यानि अलग-अलग सबके हाथ खाली। 16 मई को पिटारे से कोई जिन्न निकल आए तो यह चमत्कार ही होगा। अगर नहीं निकला और किसी तरह कोई सरकार खड़ी हो गई तो यह •भी कम चमत्कार नहीं होगा। कैसे होगा यही देखना है? दलों को पांचवे दौर से ज्यादा छठे दौर की चिंता सता रही है। परायों को अपना बनाने की चाल चली जा रही है। सियासी बिसात पर गोटियां चली जा रही हैं। बीजेपी व कांग्रेस को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की सता रही है कि कहीं वे सबसे बड़े दल की रेस ना हार जाएं? इस रेस से सत्ता की रेस के तार सबसे मजबूती से जुड़े हैं। शंकरदयाल शर्मा व नारायणन की नजीर ने इसकी महत्ता बढ़ा दी है। यह माना जा रहा है कि चुनाव पूर्व गठजोड़ पर चुनाव बाद का कुनबा ज्यादा •भरी पड़ेगा और उस पर •भारी पड़ेगा सबसे बड़े दल का तमगा। जिसे राष्ट्रपति टास के लिए बुलाएंगी उसका सरकार बनाना और बहुमत साबित करना आसान हो जाएगा। जनता पारी खेल चुकी है। प्रतिभा पाटिल की बारी है। देखना है जोड़-तोड़ की रोड़ पर कौन होड़ में बाजी मारता है?
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