देशपाल सिंह पंवार
मुंबई में जो हुआ वो सब जानते हैं। कितने मरे-किसने मारा, किसने किया ये भी सब जानते हैं। हिंदुस्तान का लगातार आंखें तरेरना, दो टूक अल्टीमेटम देना, जंग की बात करना, सीमा पर फौज लगाना तक सब जानते हैं। पाकिस्तान का मुकरना, सबूतों को झुठलाना, घुटने न टेकना,उल्टे हमें हड़काना तो सब जानते ही हैं। अमरीका का कूटनीतिक चाल चलना, हिंदुस्तान को सहलाना, पाक को नीचे से उकसाना,दुनिया के सामने बिग बास बनना भी सब जानते हैं। वही पुरानी नीति-चोर से कहना-चोरी करो और जागते रहो की पुकार करना भी सब जानते हैं लेकिन लोग यह नहीं जान पाये और शायद जान भी न पाएं कि आखिर 15 जनवरी को ऐसा क्या हुआ कि सारी तस्वीर ही उल्टी नजर आने लगी। सारी दाल ही काली नजर आने लगी। सारी कोशिश (?) ही सियासत नजर आने लगी। सारी रणनीति खोखली और नंगी नजर आने लगी। इस मोरचे पर हिंदुस्तान की हार नजर आने लगी। चाहे जो हो- जनता यह जरूर जानना चाहती है कि आतंकवादी दो- आतंकी कैंप ध्वस्त करो- पाकिस्तान सुधर जाओ की रट लगाने वाले, आखिरी सीमा तक जाने की धमकी देने वाले हिंदुस्तान का तीखा सुर कोयल वाणी में बदलने का राज क्या है? क्यों वह इस बात को मान गया कि जांबाजों का खून बहाने वाले आतंकवादियों पर पाकिस्तान में ही मुकदमा चलाया जा सकता है? क्यों व किस आधार पर यह बात उसके गले उतर गयी कि पाकिस्तान में इन पर निष्पक्ष मुकदमा चलाया जा सकता है? क्यों व किस वजह से उसने डेढ़ माह में फिर उस देश के सामने घुटने टेके जिसकी वजह से भगवन बुद्ध की यह धरती बार-बार लाल होती आयी है, अपने लाल खोती आयी है। एक अरब से ज्यादा जनता और मुंबई कांड के शहीदों की आत्मा के साथ इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है कि आतंकवादियों के गिरोह का सरगना अपनी ही जमात के आतंकियों के केस का फैसला करेगा और ऐसी अदालत को हमारा खुला समर्थन होगा। लाख टके का सवाल यही है कि अगर कोई देश आन-बान और शान के सवाल पर अपने कदम खींच सकता है। राह बदल सकता है। यू टर्न ले सकता है तो फिर इस बात की क्या गारंटी कि कल पाकिस्तानी अदालत सारे सबूतों को खारिज कर दे और एकतरफा फैसले पर हमारी मौन सहमति नहीं होगी? जानने वाले, दुनिया पर चौधराहट चलाने वाले चाहे हमारी बात न मानें, पाकिस्तान को दोषी न मानें लेकिन कड़वा सच यही है कि उन्होंने हिंदुस्तान को ठगा और हमारी हुकूमत ने जनता को बरगलाने की कोशिश की । हमारे विदेश मंत्री की जुबान फिसली या चौतरफा उबाल का असर 24 घंटे में फिर वही सुर निकालने की कोशिश जरूर की जा रही है लेकिन फटी बांसुरी से रणभेरी का सुर नहीं निकाला जा सकता। जो हुआ जनता जानती है और मानती है कि यह सब उस अमेरिका के इशारे पर हुआ जो दिन में सच बोलने का नाटक करता है और 24 घंटे झूठ के रास्ते पर चलता है। यह सब उस गोरे देश ब्रिटेन के इशारे पर हुआ जिसने सदियों तक हमारी धरती को भी रौंदा था और हमारी अस्मिता को भी ,चाहे सरकार माने या ना माने लेकिन इस बात के कई कारण हैं कि देश बैकफुट पर कई दिनों से नजर आ रहा था। लगातार कहने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का खुला समर्थन न मिलना। फिर हाल ही में ब्रिटेन का यह कहना कि फरार को सौंपना जरूरी नहीं और उन पर पाकिस्तान में ही मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके अलावा बिग बास ओबामा का शपथ ग्रहण समारोह सिर पर आना एक बड़ा कारण है। गुरुवार को तेजी से जिस तरह दोनों ओर घटनाक्रम चलते और बदलते रहे उसके बाद किसी प्रमाण की जरूरत नहीं रह जाती। दिन में पाकिस्तान जमात के सारे कैंप बंद करने का ऐलान करता है। सईद और लखवी समेत 124 से ज्यादा आतंकवादियों को गिरफ्तार करता है। आतंकवादियों और आतंकी ठिकानों को पनाह न देने की कसम खाता है। यह झूठा दिखावा करता है कि वो हमसे जंग नहीं चाहता। शाम होते-होते एक चैनल पर हिंदुस्तान के विदेश मंत्री बोलने लगते हैं कि वैसे तो सब आतंकी हमें मिलने चाहिए लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है और पाकिस्तान में निष्पक्ष मुकदमा चलता है तो उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। हां यह दिखावटी नहीं बल्कि पारदर्शी मुकदमा होना चाहिए। कम से कम किसी हिंदुस्तानी के गले तो यह बात नहीं उतरी कि आखिर किस देश से और किस बिना पर वो ऐसी आस लगा बैठा? हाथ से तीर निकल चुका था और सारी जनता का सीना छलनी कर गया था। बोल की तेज धार के वार तेज होने लगे। बीजेपी समेत सारी पार्टियां बिफरने लगीं। सरकार के अंदर खलबली मचना तय था । चौतरफा दबाव के बाद शुक्रवार की शाम होते-होते फिर विदेश मंत्री बोलते हैं कि उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा था। हम अपने रूख पर कायम है। लेकिन पाकिस्तान द्वारा जिस तरह कार्रवाई की गयी और हमारी ओर से बयान आया उससे तो यही लग रहा है कि किसी तीसरे की वजह से दोनों देशों के बीच खिचड़ी पक चुकी है। पाकिस्तान में जिनके सहारे सत्ता चलती है उन पर हाथ डालना, जेल भेजना , जमात पर पाबंदी लगाना और उपर से खुलेआम ऐलान करना यही बताता है कि अगर वो एक कदम पीछे हट रहा है तो हम एक कदम आगे कैसे जा सकता है? हमें तो लौटना ही पड़ेगा। फिर ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। अगर ऐसा होता है तो फिर सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम आखिर इतना आगे जाते क्यों हैं? आखिर क्यों? (16।1.09)
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