मंगलवार, 24 मार्च 2009

नया साल- जी का जंजाल

देशपाल सिंह पंवार
ऐसी आदत भी है और चाहत भी,नया साल आता था-राहत लाता था। हर चेहरा दमक जाता था। धमाल होता था। पर इस बार ऐसा नहीं है। 2008 चला गया- चांद दे गया,अमावस्या छोड़ गया। उसी काली रात के साथ 2009 आ गया। आफत न तो टली है और न ही 2009 की बेला भली है। हर शख्स डरा है। हर देश विचलित है। हिंदुस्तान अछूता नहीं। चाहे मंदी की लपटें यहां आकाश छूती हुई नजर न आ रही हों। पर समय ठीक नहीं है। क्या होगा इस साल तमाम कयासबाजी जारी हैं। जनता की अनगिनत चाह है। देश की कंटीली राह है। विकास दर की रफ्तार लाल निशान पर है। पैसे का संकट,बेरोजगारी, युवा वर्ग का गुस्सा, इन्फ्रास्ट्रक्चर, घूसखोरी, सेहत, शिक्षा, राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष विकास के मोर्च पर तगड़ा झटका देने की कगार पर हैं। बाहरी चुनौतियां कम नहीं-आतंकवाद, पड़ौसी देशों से बिगड़ते रिश्ते नींद उडाए हुए हैं। अर्थनीति, कूटनीति, विदेश नीति और जन नीति आसानी से काबू में आती नजर नहीं आ रही है। आर्थिक मोर्चे पर आजाद हिंदुस्तान में इससे खराब साल और कोई नहीं आया। शेयर बाजार धड़ाम। गरीब का काम तमाम। रईस तक कंगाल हो गए। एक जनवरी 2008 को निफ्टी 6000 से ऊपर था। आखिरी दिन वो 2500 के आसपास था। बाजार में मुद्रा के संकट ने बाजा बजा दिया। उधर तमाम विशेषज्ञों के बावजूद अमेरिकी नीति का जनाजा निकल गया। इसकी तर्ज पर चलने वाली हिंदुस्तान की कंपनियां धूल चाटने लगीं। देश में 20 हजार बड़ी कंपनियां हैं जिनके मुनाफे पर असर हो रहा है। छोटी कंपनियों के हालात तो और खराब हैं। उनका मुनाफा तेजी से घटने लगा है। घाटा सामने नजर आने लगा है। जहां-जहां थोड़ा कुप्रबंधन है वहां निश्चित रूप से इस साल ताले नजर आएंगे। बेरोजगार बढ़ेंगे। सरकार लगातार पैकेज की घोषणा कर रही है। सरकारी बैंकों की वाहवाही कर रही है। पर सब जानते हैं कि हमारे बैंक बहुत ज्यादा जोखिम झेलने की स्थिति में नहीं हैं। बैंकों के पास संपदा नहीं है। वे कंपनियों पर टिके रहते हैं। प्राइवेट बैंकों का यही हालत है और सरकारी का भी,पब्लिक सेक्टर के बैंकों में राजनीतिक दखल की वजह से समय पर निर्णय नहीं हो पाते। नतीजा उनसे ज्यादा आस नहीं रहती। हकीकत यही है कि अगर हमारे बैंकों को पांच फीसदी चोट पहुंची तो देश में बैंकिंग संकट पैदा हो जायेगा। अगर बैंकों की ये हालत है तो अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए वे महत्वपूर्ण रोल निभा पाएंगे यह कल्पना से परे है। विदेशी मुद्रा कोष घटता जा रहा है। लगातार तीन साल नौ फीसदी से ऊपर की विकास दर हमनें देखी। अगले साल यह 6 प्वाइंट पर अटकती नजर आ रही है। हां रिजर्व बैंक जरूर मानकर चल रहा है कि हम 7.5 तक रहेंगे। अगर ऐसा रहा तो यह ज्यादा खराब संकेत नहीं है। पर सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि देश दस करोड़ नए युवाओं को रोजगार कहां से देगा? जिस तरह 2004 के बाद रहन-सहन का ढंग बदला है उसे बनाए रखने की दिक्कत सामने आने लगी हैं। आधी आबादी 25 साल से कम की है। यह मजबूत पक्ष है लेकिन जो हालात सामने है बढ़ती बेरोजगारी उसपर घी का काम करेगी। युवाओं को झेलना दिक्कत तलब होगा। देश को अपनी ही अर्थनीति से इससे पार पाना होगा। विकास दर के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन्फ्रास्ट्रक्चर की है। साथ ही शिक्षा, सेहत और आंतरिक सुरक्षा के मसले बड़ा रोड़ा हैं। घटता उत्पादन,बढ़ती बेईमानी, खराब गर्वनेंस, गरीबी, सामाजिक संघर्ष, घरेलू आतंकवाद, बाल श्रम, महिलाओं पर अत्याचार और मौसमी मार हमें नीचे की ओर धकेल रही हैं। इस पर फतह के लिए जरूरी है अच्छा शासन। राज्यों में भी और देश में भी,गठजोड़ की राजनीति के दौर में यह मुश्किल नजर आता है लेकिन देश बचाना है तो अब दूसरा कोई चारा राजनेताओं के सामने नहीं है। सोच और क्रियान्वयन में परिवर्तन की जरूरत है। करप्शन पर काबू पाने की जरूरत है। कठोर फैसलों की दरकार है। समय पर निर्णय नहीं होता। नतीजा निराशा जन्म लेती है। अराजकता फैलती है। वर्ग संघर्ष पनपता है। आतंकवाद ने देश को गहरी चोट पहुंचायी है। 2009 में यह डर सामने खड़ा है। नक्सलवाद विकास को थाम रहा है। आतंकवाद हमें तोड़ रहा है। आए दिन के हमले हमारी आन-बान और शान के साथ मान पर चोट कर रहे हैं। अब तक आतंकवाद की कोई जात नहीं थी लेकिन अब कहीं से मुस्लिम आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद का जहर घुलता जा रहा है जो ज्यादा चिंता का विषय है। इसका असर कम करना और इसे मिटाना जरूरी है। 2001 में हमले के बाद जो गलती अमेरिका ने की वह हिंदुस्तान नहीं कर सकता। उस देश में मुस्लिमों के खिलाफ जो माहौल बना वह सबसे बड़ी गलती थी। क्या हम उसी डगर पर जायेंगे? यह सबसे बड़ा सवाल है।पड़ौसी देशों के साथ रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं। 2009 में यह एक बड़ी चुनौती है। पाकिस्तान के साथ शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा है। इस समय तनाव चरम पर है। जंग के आसार हैं। इसे टालना तो है ही साथ ही रिश्तों को बेहतर बनाना है ताकि हम सारा ध्यान विकास और मंदी पर काबू पाने में लगा सके। जंग से हालात और बिगड़ेंगे। इसके अलावा अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मयांमार, नेपाल और श्रीलंका सब अच्छे पड़ौसी साबित नहीं हो रहे हैं। हां चीन के साथ रिश्ते थोड़े बेहतर हैं जो अच्छे लक्ष्ण हैं। जहां तक राजनीतिक चुनौतियों का सवाल है। हांगकांग के एक संगठन का दावा है कि हिंदुस्तान 2009 में सबसे बड़ा राजनीतिक संकट झेलेगा। मई में संसदीय चुनाव होने हैं। आशंका यही सता रही है कि इस दौरान पाकिस्तान हिंदुस्तान में साम्प्रदायिक दंगे करा और आतंकवादी हमले करा सकता है। पाकिस्तान की अस्थिरता का सीधा असर हम पर पड़ने की आशंका जतायी जा रही है। वैसे तो यह राजनेताओं के गले नहीं उतरेगा लेकिन अगर हम ये मानते हैं कि देश संकट में है तो क्या ऐसे आपात समय में राष्ट्रीय सरकार बन सकती है? इसके नुकसान चाहे ज्यादा ना हों लेकिन फायदे ढेरों हैं। चुनाव के नाम पर हजारों करोड़ नहीं लुटेगा। काला धन नहीं बहेगा। सारा धन विकास में लगेगा। समय बचेगा। समय की नजाकत तो यही है। जरूरत यही है। खतरे बहुत हैं। पर कुछ अच्छे लक्ष्ण जरूर हैं। देश में हर उस चीज का उत्पादन होता है जो इंसान के जिंदा रहने के लिए जरूरी है। इसी कारण मंदी काल अब तक निगल नहीं पाया है। दूसरे हमारी छवि ऐसी है कि चाहे सरकार किसी की बने विदेशी निवेशकों को कोई फर्क नहीं पड़ता। खुद मनमोहन सिंह इस बात को मानते हैं कि जब-जब विपदा आती है तो यह देश दुर्योग को सुखद संयोग में बदलता नजर आया है। ज्योतिषी मानते हैं कि मंदी का कहर सितंबर तक आते-आते दम तोड़ देगा। चाहे उन पर आधी से ज्यादा आबादी यकीन न करती हो पर इस समय उनकी बात सुनकर अच्छा लग रहा है। काश ऐसा हो। 2009 का सब पर रहमोकरम हो। चारों तरफ खुशहाली हो। हमारा देश सबसे महान हो। हम सब एक सुर से यही कहें-ऐसा साल बार-बार आए। हजार बार आए। (31.12.08)

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