मंगलवार, 24 मार्च 2009

बिग बॉस

देशपाल सिंह पंवार
ईश्वर सर्वशक्तिमान है-इंसान अगर सही राह पर है तो देर सवेर उस पर ऊपर वाले का करम हो ही जाता है। कब,किसकी,कैसे किस्मत पलट जाती है और इंसान नया इतिहास रच जाता है सब देखते रह जाते हैं। बराक हुसैन ओबामा आज ऐसा ही एक नाम है। दो साल पहले तक इस शख्स को अमेरिका के बाहर जानने वाले गिनतियों में थे। आज ये नाम दुनिया के हर वाशिंदे की जुबान पर है। कल तक वो अजनबी चेहरा था, आज उनके चारों ओर भीड़ है। कल तो वो एक आम आदमी थे आज वो दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राजा है। यही है किस्मत का खेला-इस नाम ने एक झटके में अमेरिका का 220 साल का इतिहास बदल डाला। पहली बार कोई अश्वेत इस पद पर पहुंचा। वो भी एक ऐसे विजेता के रूप में जिसके आसपास लोकप्रियता के पैमाने पर कोई नहीं फटक पा रहा हो। सब जानते हैं अमेरिकी कौम आसानी से कोई बात नहीं मानती, किसी को अपना नहीं बनाती पर दूसरी दुनिया में हर कोई इस बात से हैरत में है कि पद पर पहुंचने से पहले ही ओबामा की लोकप्रियता सातवें आसमान पर कैसे पहुंच गयी? सर्वे बता रहे हैं कि 50 साल में यह करिश्मा केवल ओबामा ही कर पाए हैं। यानि एक ऐसे हीरो के रूप में छाए हैं जिसकी फिल्म रिलीज नहीं हुई हो और वो सुपर स्टार बन गया हो। एक ऐसा सुपर स्टार जिसकी ओर सारी अमेरिकी जनता हसरत से देख रही है और तनाव तथा जंग झेल रही सारी दुनिया भी,ओबामा अमेरिका की छवि संवारेंगे, अपनी जनता को संकट से उबारेंगे, सारी दुनिया को जंग से निजात दिलायेंगे, अमन और शांति का संदेश फैलायेंगे, यही सबको विश्वास है, उनसे आस है, इसीलिए सब दूर होकर उनके पास हैं। यही उनकी लोकप्रियता का असली कारण है और राजपाट के दौरान यही उन पर सबसे बड़ा दबाव भी होगा। उदास,हताश, निराश, बदहवास चेहरों पर मुस्कराहट लाने का, चमक पैदा करने का। अमेरिका के लिए यह साल दो ही बातों के लिए हमेशा इतिहास में याद किया जायेगा। एक से परेशानी की भयावता का एहसास होता है। दूसरी से हैरानी का एहसास होता है। जिस देश की ताकत की मिसालें दी जाती थी, जिसे सारी दुनिया ने अघोषित रूप से सबसे ताकतवर मान लिया था, जिसकी संगत को ज्यादातर देश किस्मत समझने लगे थे, उसी देश से एक ऐसी आंधी चली जिसने उस देश को भी तहस-नहस किया, साथ ही पूरी दुनिया को भी एक झटके में जमीन पर पटक दिया। 80 साल के बाद आर्थिक मंदी का काला साया अमेरिका पर ऐसा मंडराया कि वहां की अर्थनीतियां जिस पर सारी दुनिया चलती थी, मिसालें देती थी, छूत की बीमारी नजर आने लगी। जून से शुरू हुई मंदी की चोट ने उसके सारे सिस्टम के खोट को उजागर कर दिया। उसके बैंक और दूसरे वित्तीय संस्थान एक-एक कर डूबते चले गए और बाकी देश रेत के हवा महल की तरह लुढ़कने लगे। समय गुजरता जा रहा था, परेशानी बढ़ती जा रही थी, एक ओर ऐसा खौफनाक सीन था तो दूसरी ओर यही वो पल थे जब अमेरिकी जनता को यह तय करना था कि कौन इस देश पर राज करेगा, उन्हें बचायेगा,आर्थिक क्रांति का मसीहा बनेगा, सुपरमैन की धरती का असली सुपरमैन बनेगा। ओबामा में वो सब जनता को नजर आया। एक आम आदमी,सामान्य सा चेहरा-अपने ही बीच का कोई शख्स, ठीक जार्ज बुश के सख्त चेहरे के विपरीत। इसके बाद जो हुआ, जैसे हुआ वो सब जानते हैं। एक नया इतिहास रचा गया। 4 अगस्त 1961 को एक साधारण परिवार में जन्मे ओबामा 2005 में इलिनियोस से अमेरिकी सीनेटर बने थे और 4 नवंबर 2008 को वे 53 फीसदी से ज्यादा मतों से राष्ट्रपति पद पर पहुंचे थे। कानून के छात्र रहे ओबामा ने शिकागो ला स्कूल में 12 साल अध्यापन तक किया। वे जिस क्षेत्र में रहे, अलग हटकर अलग अंदाज में काम करते रहे। अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी सिर पर है। फिलहाल जीत का जश्न मनाने का दौर चल रहा है। वे खुश हैं, उनके चाहने वाले और ज्यादा खुश हैं। फिलहाल जैसे चेहरे वे अपनी टीम में लेते हुए दिख रहे हैं उससे आशाएं बंधती नजर आती हैं पर जो चुनौतियां उनके सामने हैं वे शायद ही किसी अमेरिकन राष्ट्रपति को झेलनी पड़ी हों। पहला अमेरिकी अर्थव्यवस्था को उन्हें मंदी से निकालना है। निवेशकों में विश्वास जगाना है। जनता के टूटे हुए सपनों पर मरहम लगाना है। यह काम फिलहाल मुश्किल सा नजर आता है। पर ऐसे कदम उन्हें उठाने ही होंगे कि जनता में आशा का संचार हो। वो कदम क्या होंगे ये देखने लायक होंगे। इसके अलावा कई मोरचों पर जिस तरह अमेरिकी फौज जूझ रही है उस पर ओबामा को अपना सारा तजुर्बा लगाना होगा। अफगानिस्तान में चाहे बुश की नीति को समर्थन मिला हो पर इराक में उनकी करनी को महज जिद ही माना गया। ऐसा मानने वाले अमेरिकी ज्यादा हैं। ऐसी अनगिनत गलतियों के कारण चंद देशों को छोड़ बाकी दुनिया में इस देश को खलनायक ही समझा जाता है। विदेश नीति के मोरचे पर उन्हें अमेरिकी छवि को बेहद ठीक करना होगा। यूरोप हो या एशिया अपनी कूटनीति के फ्रंट पर ओबामा की अग्नि परीक्षा होगी। हिंदुस्तान-पाकिस्तान के रिश्तों में हमेशा इस देश का झुकाव सीमा पार ही ज्यादा नजर आता है। इस हकीकत को ओबामा को बदलना होगा। इसके अलावा भी ढेरों ऐसी चुनौतियां उनका इंतजार कर रही हैं जिनसे निपटना आसान नहीं। चुनाव मोरचे पर उन्होंने चाहेलइतिहास रचा हो पर ओबामा को असली इतिहास रचियता तब माना जायेगा जब वे इन सारे झंझावतों को पार कर लेंगे बिल्कुल सुपरमैन की तरह। जिसकी आज गोरों को भी जरूरत है और कालों को भी/ (28.12.08)

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