देशपाल सिंह पंवार
देश की आबादी सूद की तरह बढ़ती जा रही है, मंदी की मार गहराती जा रही है,खजाने से विदेशी मुद्रा घटती जा रही है, लक्ष्मी दामन छुड़ाती जा रही है, देश की बान बिगड़ती जा रही है, हर सेक्टर की शान मिटती जा रही है, कौम की आन लुटती जा रही है, युवा पीढ़ी टूटती जा रही है, गरीबी कहर ढ़ाती जा रही है, पड़ौसियों की काली छाया फैलती जा रही है,आतंक की बेल फलती जा रही है, सुरक्षा प्रहरियों की सांसें फूलती जा रही हैं,धरती लाल खोती जा रही है,कोख उजड़ती जा रही हैं,मांग सूनी होती जा रही है, ऐसे समय जरूरत थी भाई चारे की,प्यार की,एकता की, कड़े अनुशासन की, कठोर परिश्रम की,जज्बे की, विश्वास की। लेकिन जो हो रहा है, जो दिख रहा है, जिसका डर खाये जा रहा है वो ठीक इसका उल्टा है। आए दिन वोट की राजनीति जो चोट करती जा रही है, उसका घाव नासूर बनता दिखायी देने लगा है। लोकतंत्र का कदम डगमगाने लगा है। हम की जगह मैं ने ले ली है। मुंबई मेरी है, मेरी बपौती है, मैं जो चाहूंगा, वही यहां होगा, वही यहां रहेगा, वही यहां खायेगा, वही यहां काम करेगा, वही यहां जिंदा रहेगा। काश इस तोड़ने वाली, समाज में जहर घोलने वाली सोच को समय रहते ही कुचल दिया जाता तो आज ये दिन देखने न पड़ते। कोने-कोने से नफरत की लपटें फैलती जा रही हैंं और कानून चुप है? एक शख्स गुंंडाराज चलाता आ रहा है,दूसरा उसका सिर कलम करने के लिए खुलेआम एक करोड़ के इनाम का एलान करता है, कहीं ट्रेनें जल रही हैं, कहीं अपनों को मारने की साजिशें पल रही हैं। सरहद के अंदर सरहदें खींचने की फलती-फूलती गंदी सोच। ये जंगलराज है या लोकतंत्र? सवाल राज ठाकरे का नहीं है। सवाल मराठियों और गैर मराठियों का नहीं है। सवाल ये भी नहीं है कि देश के कौन नेता क्या बोल रहे हैंं? क्या चाहते हैं? सबसे बड़ा सवाल है इस देश की एकता का। सवाल है हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई , सब हैं भाई-भाई की उस थीम का, जिस पर ये देश चलता आ रहा है। सवाल है विकास का। सवाल है मंदी से निपटने का। सवाल है गरीबी को मिटाने का। सवाल है युवा पीढ़ी के बेहतर आज और कल का। सवाल है जनसंख्या बम पर नियंत्रण का। सवाल है हर दिमाग को ज्ञान, हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी, हर तन को कपड़ा, हर सिर को छत का। सवाल है उस मजदूर कौम का-जिसके यहां दिहाड़ी के बाद ही चूल्हा जलता है। नफरत की आग चाहे धधक रही हो पर उन लाखों मजदूरों के चूल्हों की राख ठंडी पड़ी है, जो इसकी चपेट में हैं। एक वक्त की रोटी, एक जोड़ी कपड़े और सिर पर झोंपड़ी की क्या अहमियत होती है काश ये एक छोटी सी बात उन नेताओं को पता होती जो अनाप-शनाप बोल रहे हैं। ये खुद को जनप्रतिनिधि कहते हैं-महलों में रहते हैं। ये खुद को हमदर्द कहते हैं- आए दिन दर्द बढ़ा जाते हैं। ये खुद को शहर, समाज, कौम और राज्य का रहनुमा मानते हैं। काम करते हैं-शहर में तनाव, समाज में जहर, कौम में दूरी और राज्य पर बदनुमा दाग लगाने का । अंग्रेज दुश्मन थे, ये अपने हैं। वे करते थे तो गलत था और ये अंग्रेजी कल्चर की पैदाइश जो कर रही है तो उसे क्या कहें-गलत या सही? गलत कहें तो पिटने या मरने का डर, सही कहें तो.......। लोकतंत्र कहता है-जनता सर्वोपरि या जनता का राज। इतिहास कहता है-जैसा राजा, वैसी प्रजा। आज का दौर कहता है-जैसी जनता,वैसा राजा। क्या ये मान लिया जाये कि अपना राज,अपना कानून चलाने वाले चंद चेहरे जनता की ही देन हैं? जनता उनके पीछे नहीं होगी तो क्या वे इस तरह जहर फैला सकते हैं? इसमें सच्चाई है पर लाख टके का सवाल यही है कि क्या वास्तव में हमारे यहां जनता का राज है? आजाद देश का इतिहास गवाह है कि अधिकतर चुनावों में 35-40 फीसदी वोट पड़ते हैं। आधे फर्जी वोटर होते हैं। बोगस मतदाता सूची, बोगस वोटर के किस्से फैले पड़े हैं। आधी आबादी चुनाव के दिन घर से बाहर नहीं निकलती। इस तरह 15-20 फीसदी सही वोटर तकदीर लिख देते हैं। वोट की राजनीति के इसी गणित का सबसे ज्यादा फायदा अपराधियों ने उठाया और चंद सिरफिरों ने भी,70-80 के दशक तक ऐसे चेहरे नेताओं के पिछलग्गू होते थे। चुनाव जिताने की लत जीतने की ललक में बदल गयी नतीजा अपराधियों की राजनीति और राजनीति के अपराधीकरण की ये काली नदी उफान लेती चली गयी। 80 के दशक के बाद विधानसभा हो या संसद-दागियों की लंबी फौज हर बार लोकतंत्र की देहरी को रौंदती नजर आती है। काश इस देश में कभी तो 80-90 फीसदी मतदान हो। असली जनप्रतिनिधि की पहचान हो। जिंदगी आसान हो। करना जनता को ही पड़ेगा। मुंबई से उठी चिंगारी की वजह वोट की राजनीति ही है। इतिहास गवाह है कि मुंबई कभी मराठी कौम का गढ़ नहीं रही है। कभी पुर्तगालियों का कब्जा रहा तो 17 वीं मध्य शताब्दी से अंग्रेजों का। गोरों को नाकों चने चबवाने वाले और मराठियों की पहचान कायम करने वाले वीर शिवाजी महाराज ने मुंबई को अपना गढ़ नहीं बनाया। शिवाजी महाराज का गढ़ था कोंकण क्षेत्र का रायगढ़। 18वीं सदी में जब पेशवा और मराठाओं के राज का सूरज फैलता जा रहा था तो पुणे इस राज की राजनीतिक और कल्चरल राजधानी कहलाती थी। आज तक पुणे, कोल्हापुर और सतारा मराठियों के पारंपरिक शहर माने जाते हैं। कला, साहित्य और गीत-संगीत के लिए ये पहले भी विख्यात थे और आज तक हैं। हकीकत यह है कि मुंबई हमेशा ही मिली-जुली कल्चर का शहर रहा है। सिद्धांतों की जंग लड़ने वाली कौम के साथ गुंड़ा तत्व का नाम जोड़कर कौन अपना उल्लू सीधा कर रहा है, यह सब जानते हैं। मुंबई की दो करोड़ आबादी में से 30-40 फीसदी उत्तर भारतीय हैं। इनमें हिंदू भी हैं और मुसलमान भी,यही आबादी शिवसेना और मनसे के साम्राज्य स्थापित होने में सबसे बड़ा रोड़ा है जिसकी वजह से उसे बाहर खदेड़ने की चाल चली गयी। 20 फीसदी दक्षिणी हैं। मराठियों की आबादी 28 फीसदी है। इसमें से ज्यादातर अति पिछड़ा और दलित वर्ग से हैं। आजादी के बाद से ही गिरांगांव इनका गढ़ रहा है। बाल गंगाधर तिलक से लेकर दत्ता सामंत तक के दौर में यही इलाका मजदूरों के संघर्ष में हमेशा आगे रहा है। इनके साथ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया पुरबियाओं और उत्तर भारतीय मजदूरों ने। 1857 में ब्रिटिश आर्मी में काम कर रहे हिंदू और मुस्लिम पुरबियाओं ने इनके साथ मिलकर ही जंग लड़ी थी। अब उन्हें अलग करने की साजिश रची जा रही है। मंदी के दौर से देश उबर सकता है। देश विकास कर सकता है पर कड़वी वाणी ने जो जहर घोल दिया है उसे आपसी मेल से नहीं निपटाया गया तो कल और खराब होगा। जो मुंबई में हुआ वो गलत है। जो बिहार में हो रहा है वो और ज्यादा गलत है। जो दूसरे राज्यों में चल रहा है वो सबसे ज्यादा गलत है। सपा विधायक ने राजठाकरे के सरेआम कत्ल पर एक करोड़ रूपये इनाम की बात कही वह निहायत बेवकूफी है। क्या उसे जेल के अंदर नहीं होना चाहिए? इतनी सारी गलतियों को दोहराकर हम क्या साबित करना चाहते हैं? क्या इस देश से हमें प्यार नहीं है? क्या इस देश में कोई कायदा कानून नहीं है? क्या हम बिहार, पंजाब, दिल्ली या यूपी की सरहदों में ही सिसकना चाहते हैं ? सही समय यही है कि हम उन घाव पर मरहम लगायें। कानून ऐसे चेहरों पर लगाम लगाये जो अपनी जुबान से जहर घोल रहे हैं। जिस दिन हम छोटे-छोटे खानों से ऊपर उठ जायेंगे फिर कोई भी हमें बरगला नहीं सकता, उकसा नहीं सकता, अपना उल्लू सीधा कर नहीं सकता। (3.11.08)
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