बुधवार, 25 मार्च 2009

अफ़सोस

देशपाल सिंह पंवार
जिस देश की आबादी बनिया के बही खाते के ब्याज की तरह बढ़ती जा रही हो, गरीबों की तादाद का सेंसेक्स चढ़ता जा रहा हो,मंदी की मार से हजारों युवाओं की नौकरी छिनती जा रही हो,अपराध के नये आयाम स्थापित होते जा रहे हों, आम आदमी के बच्चों से शिक्षा दूर होती जा रही हो, दो वक्त की रोटी,सिर पर छत की चिंता में आधी जनता की सेहत बिगड़ती जा रही हो, आतंक के कहर से देश की हालत खराब होती जा रही हो हैरत की बात है कि वहां प्रेम लीलाओं के चलते राजनीति की थीम बहक रही है। वहां की जनता चांद-फिजा की कहानी पर चहक रही है। वहां की फिजा में चांद-फिजा महक रही है। वैसे इसके लिए किसे दोष दिया जाए- जिस देश का हर बच्चा दादा-दादी,नाना-नानी की कहानी सुनकर बड़ा होता हो वहां कहानियों का मोल क्या होता है यह समझा जा सकता है ,फिर इस किस्से में तो हर वो एंगिल छिपा है। जिस पर गुस्सा आ सकता है। दर्द उठ सकता है। कड़वाहट निकाली जा सकती है। चटखारे लिए जा सकते हैं। जिसकी जैसी सोच-वैसा एंगिल। जितने मुंह-उतनी बातें। हां यह तय है कि अगर इसमें एक राजनेता शामिल न होता तो शायद इतना तमाशा न होता। अगर वो शादी शुदा न होता तो शायद इतना बखेड़ा न होता। अगर चांद और फिजा(?) की शादी का ये अंजाम न होता तो शायद इतना प्रेम का उपहास न होता। अगर इस कहानी में मीडिया का रोल न होता तो शायद इतना प्रचार न होता। अगर राजनेता ऐसा न होता तो ये सब न होता। न ये गूंज होती। न जग हंसाई होती। आखिर परिवार का क्या कसूर? आखिर बच्चों का क्या कसूर? आखिर पहली पत्नी का कसूर? आखिर फिजा का क्या कसूर? आखिर उस जनता का क्या कसूर जो ऐसे राजनेताओं को सिर माथे पर बैठाती है? लाख टके का सवाल यही है कि आखिर राजनेता इस राह पर जाते क्यों हैं? क्यों उनकी नैतिकता जवाब दे जाती है? क्यों वे व्यक्तिगत इच्छाओं के आगे जनता को कुर्बान कर देते हैं? कड़वा सच यह •ाी है कि चांद या चंद्रमोहन न तो ऐसे पहले राजनेता हैं और न ही आखिरी। यह धारा आज उफान पर है। खतरे के निशान पर है। राजनीति आंकड़ों का खेल है। पावर का मेल है। दौलत-शोहरत की रेलमपेल है। आखिर जिस क्षेत्र की नींव ही इस पर टिकी हो, जहां ताकत और दौलत की नदियां बहती हों वहां ऐसी कहानियां हर पल जन्म लेती हैं। कोई इस बात का दावा नहीं कर सकता कि राजनेताओं के प्रति महिलाओं का आकर्षण या राजनेताओं का महिलाओं के प्रति रुझान पहले नहीं हुआ है और आगे नहीं होगा । इतिहास गवाह है। आदि काल से होता आया है। हो रहा है और होता रहेगा। पहले ज्यादा नेता इस कोयले की खान से दूर थे। अब यह संख्या कुछ कम है आगे हो सकता है कि उंगलियों पर गिनने लायक ही बचें। हकीकत यही है कि इस देश में आज की तारीख में कोई इस बात की गारंटी नहीं ले सकता कि राजनीति की यह धारा साफ सुथरी बह रही है और आगे बहेगी। आजादी के बाद से ही नेताओं के प्रेम किस्से हवाओं में तैरने लगे थे। समय गुजरता गया और नेता तथा उनके किस्सों की किताब मोटी होती गयी। चाहे इस राह पर खुलेआम कम नेताओं ने सफर तय करने की हिम्मत जुटायी हो पर काजल की कोठरी में कंबल ओढ़कर घी पीने वालों की तादाद इतनी ज्यादा है कि अगर ईश्वर का दबाव हो और नेताओं को एक पल के लिए मजबूरी में सच बोलना पड़े तो अंतरंगता से जो परदे हटेंगे उससे यह तय है कि राजनीति का परदा ही हमेशा के लिए गिर जायेगा। राजनीति के धुरंधर हमेशा मानते आये हैं और मान रहे हैं कि जो सीन सामने है, परदे के पीछे की हकीकत उससे हजार गुणा खराब है। सब इस दलदल में शामिल न हों पर ढेरों नेता ऐसे हैं जो शादीशुदा होने के बावजूद दूसरी महिलाओं से जुड़े है। किसी राज्य का उदाहरण ले लीजिए सबका यही हाल है। एक हिंदी राज्य तो ऐसा है जहां के हर तीसरे नेता ने या तो दूसरी शादी रचाई या फिर किसी महिला के साथ रिश्ते आम रखे। 2007 में इस राज्य के एक कैबिनेट मंत्री का नाम उछला। घर टूटते-टूटते बचा। दूसरी महिला को जेल जाना पड़ा। मंत्री की गद्दी गयी सो अलग। एक अन्य खानदानी नेता की दूसरी पत्नी मौत के बाद संपत्ति की जंग लड़ रही है। एक बड़े नेता ने दूसरी शादी रचा डाली-पहली बीबी मरते दम तक फिर शक्ल ही नहीं देख पायी। एक और बड़े नेता की बीबी ने दूसरी के चक्कर में जान दे दी पर वो नहीं सुधरे। अब बेलगाम हैं। जिसका राज खुल गया वो बदनाम, बाकी..। हकीकत यही है कि जब तक ढेरों नेता जनता के बीच रहते हैं वे शरीफ नजर आते हैं, जैसे ही पावर और मनी का मेल होता है इस डगर का सफर शुरू होता है। सब जानते हैं कि बड़े-बड़े काम कैसे कराये जाते हैं। या तो माया का रोल या फिर...। यह •ाी सच है कि जब कोई शादीशुदा शख्स नया प्रेम संबंध बनाता है तो वह सिर्फ प्यार नहीं होता। इसमें रूतबा, आर्थिक सुरक्षा और पारिवारिक कारण तक जुड़े होते हैं। इसके अलावा क्षणिक आकर्षण। रिश्ते बनाना आसान है पर उसे चलाना उतना ही मुश्किल। जैसे ही हकीकत के थपेड़े पड़ते हैं तो प्रेम गायब। तमाम रिश्तों के साथ धोखा। प्रेम अपराध नहीं लेकिन पहली पत्नी के होते दूसरी शादी, दूसरी औरत से प्रेम, शारीरिक संबंध को न कानून और न ही नैतिकता के नाते जायज ठहराया जा सकता। खासकर नेताओं के मामलों में। जनता में गलत संदेश जाता है। विश्वास टूटता है। सामाजिक और राजनीतिक मर्यादा का पालन होना ही चाहिए। ऐसे चरित्र के नेताओं का राजनीति और सामाजिक स्तर पर तिरस्कार जरूरी है। शायद ये दिन आए पर जल्दी आए तो ज्यादा बेहतर। (यह लेख काफी पहले लिखा गया था)

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