देशपाल सिंह पंवार
वक्त क्या-क्या रंग दिखाता है? कभी छोटी सी जीत को मन तरसता है। मिलने पर खूब चहकता है। कभी बड़ी जीत पर दिल भी मायूस और चेहरा भी,इस बार हमारी जीत-विश्व चैंपियन की हार यही एहसास करा रही है। इतिहास में दर्ज होगा-हमने 2008 में कंगारूओं को नचाया था, हराया था। पर बड़ी कीमत भी चुकायी थी। जंबो और दादा की विदाई का गम झेला था। मजबूत दीवार (राहुल द्रविड)को दरकते हुए देखा था। लक्ष्मण को लाज बचाते देखा था। सचिन की तरफ तनी उंगलियों को देखा था। बिस्तर से ज्यादा क्रिकेट के दीवानों को निराश-हताश और उदास देखा था। यह सच है। वे जीत से जितने खुश हैं -दादा और जंबो की जुदाई से उससे ज्यादा दुखी। जीत की ये कुर्बानी पच नहीं रही है। सोचिए अगर हार जाते तो॥। दो की संख्या पांच होती। तब? कहा जाता है-जो होता है अच्छा ही होता है। इसमें क्या अच्छाई छिपी हुई है यह तो विधाता ही जाने पर यह सिलसिला न तो जंबो व दादा से शुरू हुआ है और न इन पर खत्म होगा। ये बेजोड़ हैं,खुशकिस्मत हैं इसीलिए विदाई सुर्खियों में है। वरना क्रिकेट का इतिहास कारनामों से अटा पड़ा है। क्रिकेटरों को हमेशा ताश के पत्तों की तरह फैंटा गया। समझदार खुद निकलते रहे। ढेरों धकियाये जाते रहे। सैंकड़ों को रिटायर करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। देख लीजिए-76 साल में लार्ड्स से नागपुर तक 425 टेस्ट खेले। सी के नायडू से लेकर एम विजय तक 260 क्रिकेटर मैदान में उतारे। सौ से ज्यादा आया राम-गया राम ही रहे। कोई एक टेस्ट खेला तो कोई दो। बिना रिकार्ड बुक देखे कोई बता सकता है उनके नाम। पर वो आये भी और गये भी,यही कुदरत का संगीत है। यही जिंदगी का गीत है। यही जमाने की रीत है। परिवर्तन तय है। यही नियम जीवन पर लागू होता है। यही नियम क्रिकेट पर लागू होता है। आका की नजर पर टिका रहता है। मोल खत्म-रोल खत्म। विदाई और अच्छाई का ये कौन सा रिश्ता है? कौन सी परम्परा है? जब तक कोई महान क्रिकेटर रिटायर नहीं होता,जाने की बाट जोहते रहते हैं। सारे खोट नजर आते रहते हैं। जब जाने का वक्त आता है तो मानस पटल पर सिर्फ अच्छाई ही अच्छाई काबिज रहती है। यही कड़वा सच है। जंबो अब तुम उडान नहीं भरोगे -मैदान पर नहीं उतरोगे। उंगलियों का जादू नहीं दिखाओगे। बल्लेबाजों को नहीं छकाओगे। गिल्लियां नहीं बिखोरेगे। यकीन नहीं होता पर करना तो पड़ेगा। यही तुम्हारा फैसला है। यही हमारी मजबूरी है। 18 साल की आदत है। उबरने में थोड़ा समय लगेगा। दिल मानने को तैयार नहीं कि तुम खुद चले गए। जेहन में यही जद्दोजहद है कि कुछ तो गड़बड़ है। कारण-तुम बदलने वालों में से रहे हो,पीठ दिखाने वालों में से नहीं। तो फिरअब क्यों? यही करना था तो पहले कर सकते थे कई बार ऐसे मौके आए। तुम तब कर सकते थे जब विश्वकप में तुम्हें बैंच पर बिठाया गया। तब कर सकते थे जब हम श्रीलंका से पिटकर लौटे। जो दलील तुमने दी हम कैसे मान लें? 6 साल पहले वो तुम ही थे। एंटीगुआ का मैदान। टूटा हुआ जबड़ा। दूसरा कोई होता-बिस्तर पर कराहता नजर आता पर तुम बल्ला लेकर मैदान में थे। सब हैरान थे। अब ऐसा क्या हुआ? हमें तो तुम्हारा शरीर बूढ़ा नजर नहीं आता। कंधे झुके हुए नजर नहीं आते। उंगलियां थकी हुई नजर नहीं आती। हां ये हो सकता है कि विकेट कम मिल रहे हों पर तुम तो आशावादी थे। एक साल तो खेल सकते थे।फिर?आखिर सच क्या है? तुम तो नहीं बताओगे पर एहसास सबको है। समय बता ही देगा कि दाल में कुछ काला था या फिर सारी दाल ही काली है? बोर्ड की राजनीति से तुम वाकिफ हो और हम भी,सच बताओ क्या वही पुरानी कहानी नहीं दोहराई गई? क्या तुम्हें कप्तानी नहीं ले डूबी? बेंगलूर में तुम्हारा चोट खाना, मोहाली में अमित मिश्रा का चमकना, धोनी की कप्तानी में जीतना,नकली चोट के नाम पर दिल्ली में सरदार का बाहर बैठना-सारा सच सामने है। बस अब और नहीं-यही था ना बोर्ड का इशारा। समझदार को इशारा ही काफी है। नागपुर तक खेल सकते थे पर कोटला से बेहतर अवसर और क्या होता? हां जब तक खेले-खूब खेले। हम दुखी हैं और खुश भी,दुखी इस बात पर -तुम मैदान छोड़ गए। खुश हैं तो सिर्फ सम्मान के साथ विदाई पर। तुम्हारे जैसा ना कोई था, ना है और ना होगा। हमेशा दिलों पर राज करोगे। वहां से तुम कभी रिटायर नहीं हो सकते। चाहने वाले बेमुरव्वत नहीं हैं। हां राज करने वालों की यह फितरत हमेशा रही है। दादा तुम भी अब ड्रेसिंग रूम में दिखाई नहीं दोगे। कैसा लगेगा तुम्हारे बिना? चाहे लक्ष्मण कुछ बोलें या राहुल मुंह ना खोलें पर यह तय है कि ये जल्दी ही तुम्हारी सूची में शामिल होने वाले हैं। दादा इसमें दो राय नहीं कि तुम्हारे साथ बोर्ड ने ज्यादती की। कोई बताए-तुम्हारे जैसे बोल्ड और गोल्ड कप्तान कितने रहे? तुम्हारे जैसे जीवट के क्रिकेटर कितने हुए? तुम रहमोकरम पर न तो टीम में आए-न रहे, न कप्तान बने। तुमने इंडिया को लगातार जीतने की आदत डाली। 49 टेस्ट में 21 में जीत। सी के नायडू से अजीत वाडेकर तक 16 कप्तान 136 टेस्ट खेलकर इतने टेस्ट जिता पाये थे। वन डे में भी हम तुम्हारी कप्तानी में 146 में से 76 मैच जीते। 113 टेस्ट और 7000 से ज्यादा रन। और बहुत कुछ। बोर्ड के आकाओं की चाह को तुमने हमेशा मुंह तोड़ जवाब दिया। इस बार सीरीज से पहले जिस समय तुम रिटायरमेंट का ऐलान कर रहे थे, तुम्हारे चेहरे के तेज से वही जज्बा झलक रहा था। तुम कुछ करोगे-सबको आस थी। तुमने किया। तुम असली बंगाल टाइगर थे, हो और रहोगे। तुम मूंछे ऐंठकर जा रहे हो और वे मुंह छिपाये बैठे हैं। सारा देश पूछ रहा है कि और कैसा खेल दिखाना पड़ता है? खेल जरूरी है या शक्ल? इसका जवाब बोर्ड के पास नहीं होगा। पर बोर्ड को समझने में कैसे चूक गए? कप्तानों के साथ यही तो होता आया है। 31 में से कितने जबरन हटाये गये सबको पता है। सी के नायडू, लाला अमरनाथ, विजय हजारे, वीनू मांकड़, पाली उमरीगर, नबाब पटौदी, चंदू बोर्डे, अजीत वाडेकर, बिशन सिंह बेदी, सुनील गावस्कर, कपिल देव व अजहरूद्दीन को इन्होंने नहीं बख्शा तो फिर बाकी की क्या बिसात? यह पूरा ग्रंथ है। हैरत है कि सचिन से भी सबक नहीं सीखा। 25 टेस्ट और 73 वन डे में ही सचिन का मन भर गया था। जान गये थे कि कप्तानी ले डूबेगी। तौबा की। नतीजा सामने है। कप्तान होते तो विदा हो जाते। फिलहाल धोनी के सितारे बुलंद हैं। जिस दिन हार से सामना होगा, बोर्ड आंखें तरेरना शुरू कर देगा। यही होता आया है। यही होगा। बस वक्त की बात है। क्या कभी कोई इतिहास को सिखा पाया है? सिर्फ बोर्ड ही ये करिश्मा कर सकता है। इंतजार करिए अगले शिकार का। साथ ही उस दिन का जब सचिन रिटायर होंगे। वो इंडियन क्रिकेट का सबसे बड़ा रिटायरमेंट होगा।भूतो न भविस्यतो (8।11.08)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें