शनिवार, 2 मई 2009

टोन पर टूटा मौन



देशपाल सिंह पंवार
कहावत है कि शादी एक ऐसा लड्डू है, जो खाए वो भी पछताए, और जो ना खाए वो भी पछताए। कुछ इसी तरह का आलम आजकल मोबाइल को लेकर हो गया है। उसके बिना चलना गंवारा नहीं और उसके बिल के साथ गुजारा नहीं। 2000 तक विरलों के पास मोबाइल हुआ करते थे। जरूरत के साथ-साथ स्टेटस सिंबल भी प्रमुख कारण था। 21वीं सदी आर्थिक उदारवाद की लहर लाई। बाजार पर दौलत की चकाचौंध छाई। दुनिया को मुट्ठी में करने की इंसान की चाहत को पंख लगे। समय की नब्ज को सबसे ज्.ादा मोबाइल कंपनियों ने पहचाना। रेवड़ियों की तरह पैकेज दिए। देखते ही देखते अमीर की जेब का खिलौना गरीब के हाथ तक में नजर आने लगा। मोबाइल जरूरत में शामिल हो गया। सबसे तेजी से बढ़ने वाला धंधा। देश की एक चौथाई से ज्यादा आबादी के हाथ में अब मोबाइल है। ज्यादातर ग्राहक ऐसे भी हैं जिनके पास कई-कई मोबाइल हैं। यह सत्य है कि अब इसके बिना गुजारा नहीं। जरूरत आविष्कार की जननी होती है इसीलिए मोबाइल कंपनियों की मनमानी बढ़ती गई। तरह-तरह से गा्रहकों को लूटने के तरीके इजाद कर लिए गए। हर पल तरह-तरह के एसएमएस से सब परेशान रहते हैं। मातम का माहौल होता है और खुशी के गीत की घंटी बज जाती है। ऐसे में कैसा लगता है हर मोबाइल धारक इससे जरूर वाकिफ होगा। प्रीपेड और पोस्टपेड ग्राहक को पता भी नहीं चलता कि कब और क्यों और किस तरह उसका बैलेंस खत्म हो गया या कैसे उसके बिल में ऐसी रकम जुड़कर आ गई? शिकायत का कभी असर होता नहीं। साफ कह दिया जाता है कि यह मुख्यालय से हुआ है। क्यों हुआ है कभी पता नहीं चल पाता। नतीजा भारत में मोबाइल ग्राहक जितना पैसा अपनी जरूरत की काल पर खर्च करते हैं उसका आधा धन मोबाइल कंपनियां अपने हथकंड़ों से अंदर करती आ रही थीं। यूं तो ट्राई बार-बार अंकुश लगाती आ रही थी पर उसके नतीजे जनता का उतना कल्याण नहीं कर पाए जितना होना चाहिए था। मोबाइल कंपनियों की मनमानी पर एक बार फिर ट्राई ने कोड़ा चलाया है। साफ कहा है कि बिना धारक की लिखित सहमति के किसी भी सेवा को जबरन नहीं थोपा जाएगा। गलती से कोई बटन दब जाने का मतलब यह नहीं है कि ग्राहक रिंग टोन, जोक्स आदि-आदि सेवाएं लेना चाहता है। ट्राई ने 45 दिन का समय दिया है और कहा है कि इस अरसे में किसी भी तरह सारी कंपनियां इस काम को पूरा कर लें। ट्राई के इरादे नेक हैं। धारकों को राहत मिलनी भी चाहिए लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मोबाइल कंपनियां सौ फीसदी इस फैसले को लागू करेंगी? सवाल यह भी है कि इस बात की क्या गारंटी है कि तब तक कोई दूसरा तरीका लोगों की जेब हल्की करता नजर नहीं आएगा?

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