शनिवार, 2 मई 2009

सिंग इज किंग



देशपाल सिंह पंवार
राजनीति की माया ही अलग है। कुछ नेता जहां से चुनकर आते हैं उसे बिसरा जाते हैं और दिल्ली की राजनीति में रम जाते हैं। राष्ट्रीय नेता बनने के सारे ख्वाब देखते हैं और दुनिया को मुट्ठी में दबाने की कोशिश में जुटे रहते हैं। नतीजा कोई दिल्ली के सत्ता के गलियारों के लिए पर्याय बन जाता है तो किसी से एक दिन जनता नजरें फेर लेती है और वे कहीं के नहीं रहते। ये वनडे क्रिकेट की तरह अपनी पारी खेलकर विदा हो जाते हैं। ऐसे ढेरों उदाहरणों से देश की राजनीति के पन्ने अटे पड़े हैं। कुछ समझदार नेता ऐसे होते हैं जिनके कद राष्ट्रीय स्तर के होते हैं पर वे अपनी जमीन कदापि नहीं छोड़ते। लंबी पारी खेलते हैं। बिल्कुल टेस्ट की तरह। किसी भी आंधी-तूफान का कोई असर नहीं। वे बरगद के पेड़ की तरह अपनी जगह या कहा जाए राज्य की सबसे क्रीम सीट पर या तो बैठे रहते हैं या उस पर बैठे किसी भी नेता को उतारने से बस एक कदम दूर नजर आते हैं। पंजाब का यह सरदार इसी श्रेणी के नेताओं में है। आज की तारीख में पंजाब की राजनीति में उसकी टक्कर का कोई दूसरा नेता नहीं। आजादी के समय वो राजनीति में आया। 52 साल पहले विधायक बना। चौथी बार मुख्यमंत्री की गद्दी पर है। 40 साल पहले जब वो पहली बार इस प्रांत का सीएम बना था तब सबको ऐसा लगता था कि ये बादल न तो लंबे अरसे तक बरसेंगे और न ही सिंह का प्रकाश पंजाब की धरा में वो रंग घोलेगा जिसमें जीने की इस कौम को आदत है और जो इसकी परंपरा है। पर इस शख्स ने सबको झुठला दिया। वो हार के बाद फिर पलटवार करता और इस गद्दी पर जा बैठता। उसे हटाने, मिटाने की कोशिशें कम नहीं हुई पर वो कभी नहीं डिगा। लाख बेईमानी और परिवारवाद के आरोप इसके दामन पर लगे पर जनता में गहरी पैठ होने से सबकी बोलती बंद होती गई। समय और वोटर की नब्ज पहचाने के पारखी इस शख्स को केंद्र की राजनीति कदापि नहीं सुहाई। सांसद बनकर देखा। केंद्रीय मंत्री की गद्दी का स्वाद चखा पर मन हमेशा पंजाब में ही रमा रहा। वहां रहकर भी वो तन-मन से पंजाबी ही रहा। इस बार के आम चुनाव में उसके नाम की गूंज ज्यादा नहीं है पर जिस तरह के विखंडित जनादेश के हालात सामने हैं उसमें नतीजों के बाद इस शख्स की महत्वपूर्ण अदाकारी होगी इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि ढेरों नेता उसके सामने हाथ जोड़े अभी से खड़े नजर आते हैं। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अपने स्वर्णिम काल में ही इस राजनेता ने अपनी गद्दी का वारिस बनने लायक अपने बेटे को बना दिया है। अब इस पर किसी को एतराज हो या नहीं। पंजाब के इस सरदार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता । क्योंकि सेहत की नेमत इस राजनेता पर खूब बरसी है।
सरदार प्रकाश सिंह बादल

0-पंजाब के गांव अबुल खुराना में 8 दिसंबर,1927 को सरदार रघुराज सिंह के घर जन्म। एक बेटा और एक बेटी। बेटा सुखबीर सिंह बादल सांसद। पूर्व केंद्रीय मंत्री। बेटी की शादी प्रतिष्ठित कैरों परिवार के आदेशप्रताप सिंह के साथ। देश की आजादी के वक्त राजनीति में बादल का प्रवेश। पंजाब के हितों के लिए राजनीति को अपनाया। पंजाब के बड़े किसानों में से एक। 1957 में पहली बार विधायक निर्वाचित। 69 में फिर विधानसभा में। 69-70 में पंचायती राज,पशुधन संसाधन और डेयरी मंत्री। शिरोमणि अकाली दल के पूर्व अध्यक्ष। चार बार 70-71,77-80,97-02 और अब फिर पंजाब के मुख्यमंत्री। कांग्रेस मुख्य विरोधी दल। हमेशा कांग्रेस से ही मुकाबला। पहली और दूसरी बार मुख्यमंत्री पद से हटे तो राष्ट्रपति शासन। 2002 में कांग्रेस सत्ता में आई। अमरिंदर सिंह ने पद संभाला ,2007 में फिर शिरोमणि अकाली दल का राज। बादल सर्वमान्य और गैरविवादित नेता। आपातकाल के बाद मोरारजी देसाई सरकार में केंद्रीय एग्रीकल्चर और सिंचाई मंत्री। सांसद भी रहे। 2007 में देश के सबसे रईस 10 नेताओं में से एक। पंजाब की जनता पर मजबूत पकड़। बिना लाग लपेट के अपनी बात कहने के आदी। प्रतापसिंह कैरों के समधी और पूर्व मुख्यमंत्री व राज्यपाल हरचरण सिंह बरार के रिश्तेदार। पंजाब के खानदानी रईस। पंजाब की तरक्की में महत्वपूर्ण योगदान।

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