शनिवार, 2 मई 2009

नाम शरद-काम गरम


देशपाल सिंह पंवार
अगर आप आदत से वाकिफ नहीं हैं तो मिलने पर लगेगा कि गुस्से में हैं। पता नहीं कब क्या बोल देंगे? जैसे ही मिल लेते हैं तो सारी शंकाए रफूचक्कर हो जाती हैं। तना हुआ चेहरा, छोटी-छोटी सफेद दाढ़ी, बिना तकल्लुफ बात करने और ठीक हो कहने की आदत,परिचय होने पर कंधे या पीठ पर हाथ रखकर अपनत्व दर्शाने का एहसास और सबसे बड़ी बात- पावर हो या पैदल हर समय हर किसी के लिए किसी भी सही काम के लिए ना नहीं कहने और उसे करने की ललक से यह राजनेता दूसरों से खुद को अलग रखता है। बचपन में नेता बनने का सपना तो नहीं देखा था हां यह जरूर चाहा था कि समाज के लिए कुछ किया जाए। जिस तरह की पढ़ाई की थी उससे नौकरी कोई मुश्किल नहीं थी पर समाज सेवा के चक्कर में जब तक पूरी तरह नौकरी की दिशा में जाते तब तक राममनोहर लोहिया, चौधरी चरण सिंह की संगत ने काया ही पलट दी। समाजवादी सोच दिल और दिमाग पर इस तरह हावी हो गई थी कि न खाने की सुध रहती थी और न ही आजकल के नेताओं की तरह धन बटोरने की चाह से कभी नाता जुड़ पाया। युवावस्था में जो अलमस्त अंदाज था वही आज भी है। जब कुछ नहीं पाया था तब भी ऐसा ही चाल-ढ़ाल और हाल था आज भी ऐसा ही है। हां जिद्दी पहले से ही हैं। चाहे कैसा भी गठजोड़ हो, कैसी भी दोस्ती हो अगर कोई गलत बात दिखती है तो मुंह फुलाकर घर में नहीं बैठते बल्कि बीच चौराहे पर एक मिनट में सारा गुस्सा उड़ेल देते हैं। नतीजा फिर चाहे जो हो। तमाम बार इसका खामियाजा इस नेता ने भोगअ पर आदत है कि छूटती नहीं। हौशंगाबाद जिले में पैदा होकर यूपी के बदायूं और शाहजहांपुर तथा बिहार के मधेपुरा में जाकर जीतना कोई आसान बात नहीं। पर यह राजनेता हर जगह जनता को अपने बीच का ही बंदा नजर आता था। यह राजनेता हकीकत में कदापि किंग तो नहीं बन पाया पर किंग मेकर के रोल में कई बार नजर आया। जिस लालू प्रसाद से बाद में छत्तीस का आंकड़ा रहा उसे सीएम की गद्दी तक पहुंचाने और बैठाने वाला यही शख्स रहा। इसका अफसोस उसे आज भी है। बिहार में चाहे नीतीश का जनाधार उससे ज्यादा हो लेकिन पार्टी में कद आज भी इसी नेता का बड़ा है। यह बात दीगर है कि पार्टी का मुखिया बनने के लिए जार्ज जैसे वरिष्ठ को किनारे लगाया गया। किसी को हटाकर या मिटाकर गद्दी हासिल करने की तमाम नेताओं की सोच का यह शख्स कभी हिमायती नहीं रहा पर राजनीतिक जीवन में इस मोड़ से उसे गुजरना ही पड़ा। चाहते हुए भी और ना चाहते हुए भी उस राह पर उन्हें जाना ही पड़ा जहां हमेशा यह जरूर कहा जाएगा कि जार्ज जैसे नेताओं के साथ बुरा या तो उन्होंने किया या फिर नीतीश कुमार ने कराया। बीजेपी से तमाम मसलों पर असहमति हैं लेकिन राजनीति की धारा में उनके साथ वे बह रहे हैं मजबूरी में नहीं बल्कि मर्जी से। मेहनती हैं। बीच-बीच में सेहत बिगड़ जाती है पर बिहार के नतीजे इस बार उनकी स्थिति मजबूत करेंगे इसके पूरे-पूरे आसार हैं। वे मुलायम और लालू की तरह भी नहीं हैं। उनकी किसी से बनती जल्दी है पर यह भी सत्य है कि कब किससे बिगड़ जाएगी यह भी नहीं कहा जा सकता। इस बार किससे बनेगी और किससे बिगड़ेगी कहना मुश्किल है?

शरद यादव

0-हौशंगाबाद (मध्यप्रदेश) जिले का बाबई गांव-2 जुलाई 1947 को एक किसान परिवार में जन्म। पिता नंदकिशोर यादव और माता सुमित्रा देवी। बेटे को ज्यादा पढ़ाने की चाह। जबलपुर विवि से बीएससी, और बी ई (इलेक्ट्रिकल ) की उपाधि। बेैडमिंटन के शौकीन। समाज सेवा और राजनीति में गहरी रूचि। क्लासिकल संगीत, इतिहास और कल्चरल एक्टिविटी में। 89 में डा रेखा यादव से शादी। एक बेटा और एक बेटी। महात्मा गांधी, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर की सोच का गहरा असर। अपने दम पर राजनीति में आगे बढ़े। शाहजंहापुर, बदायूं से लेकर मधेपुरा बिहार तक चुनाव लड़े। 74-77 में संसद में पहुंचे। फिर 77-79 तक रहे। 86 में उच्चसदन में। 89-91 में फिर निचलेसदन में। 90 में केंद्रीय कपड़ा और खाद्य मंत्री। फिर दसवीं, 11 वीं, 13 वीं संसद के सदस्य। 99-01 में केंद्रीय उड्डयन मंत्री। फिर श्रम मंत्री। फिर खाद्य और जनवितरण मंत्रालय । 04 में मधेपुरा में लालू प्रसाद से हारे। उच्चसदन में प्रवेश। 06 में बिजनेस सलाहकार समिति में। इसके अलावा तमाम अन्य कमेटियों के सदस्य। 2006 में जनता दल युनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष। जार्ज की जगह पर राजग के भी कार्यकारी संयोजक निर्वाचित। नीतीश कुमार के साथ अच्छी जोड़ी। पार्टी में फूट। जार्ज और दिग्विजय सिंह अलग-थलग। अंतत पार्टी से बाहर। सिर्फ बिहार में ही पार्टी का जोर। इस बार चुनाव में साख दांव पर। खरी-खरी बोलने की आदत। इसका काफी खामियाजा झेला। चेहरों को हमेशा याद रखने और मदद करने की आदत।

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