
देशपाल सिंह पंवार
पी सी: जैसा नाम-वैसा काम। आज वो पी सी की तरह ही है। उसका दिमाग कंप्यूटर की तरह ही चलता है। हर जानकारी खोपड़ी में दर्ज। किसी की जरूरत नहीं। सवाल करो-जवाब हाजिर। शायद ये परवरिश का असर है। उसकी मेहनत का फल है। वो एक शाही परिवार में जन्मा। शाही अंदाज में पढ़ा। शाही हार्वर्ड विवि से एमबीए किया। शाही कंपनियों या हस्तियों का वकील रहा। शाही मुकदमें ही देश-विदेश में लड़ता रहा। जुबान की कमाई खाते-खाते एक दिन वो उंगलियों पर हिसाब-किताब में मास्टर हो गया। शोहरत के किस्से देश-दुनिया में फैलते गए। मजबूरी से राजनीति में आए राजीव गांधी को ऐसे ही चेहरों की हमेशा तलाश रहती थी जो युवा हों, कुछ नया करने का हौसला हो, देश को तरक्की की राह पर ले जा सकते हों। इस वकील में वो सारी झलक राजीव को दिखाई दी। नतीजा चट मंगनी और पट शादी। 39 साल की उम्र में वो राजनीति में आया। शिवगंगा की जटाओं के जादू से सांसद बन गया और 40 पार करते ही राजीव सरकार में मंत्री। 90 के दशक के बाद का इतिहास जब भी लिखा जाएगा तब इस नेता का नाम हमेशा सुर्खियों में लिखा जाएगा। बाकी जलने वाले चाहे जितना हल्ला-गुल्ला करें पर मंदी के बावजूद देश आज जिस स्थिति में है उसका क्रेडिट उसके खाते में ही जमा होना चाहिए। मनमोहन और मोंटेक के साथ मिलकर आर्थिक उदारवाद की धारा बहाने में उसने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। वो दिल से चलता है पर फैसले दिमाग से करता है। वो मीठा बोलता है पर फैसले कड़वे करता है। जब तक वो खजाना मंत्री रहा कभी राजनेताओं की तरह वोटरों को खुश करने की कोशिश नहीं की। वह यही मानता था, कहता था और करता था कि मीठी दवा पीकर मरने से बेहतर है-कड़वी दवा पीकर बीमार बाग में टहलता नजर आए। इसी वजह से आमिर भी उससे परेशान रहे और नौकरी पेशा भी, आयकर में छूट की आस उसके रहते कभी पूरी नहीं हुई। आम आदमी की सेहत सुधारने की बजाय वो देश की सेहत की चिंता का बजट पेश करता रहा। उसे प्यार करने वाले चाहे कम रहे हों पर उसे कोसने वालों की संख्या कभी कम नहीं रही। इसके बावजूद उसकी न तो महत्ता कम हुई और न ही जरूरत। जुबान से ज्यादा उसका काम बोलता है। तमिल स्टाइल का पहनावा, गंभीर चेहरा, चश्में से घूरती आंखें पहले उद्योगपतियों को डराती थी और अब देश के खिलाफ साजिश करने वालों को। वो देशहित में फैसलों पर कभी समझौता नहीं करता। यही सोच उसे दूसरे नेताओं से अलग रखती है। वो राजनेता से ज्यादा कठोर अफसर नजर आता है। यह भी सच है कि वो 25 साल से राजनीति में है पर आज भी बाकी नेताओं की तरह राजनीति करनी नहीं आती। वो कभी तिकड़म नहीं करता पर 84 से लगातार चुनाव जीतता आ रहा है। वो कभी कांग्रेस को चुनाव नहीं जिता पाता पर गद्दी की रेस में पहले तीन घुड़सवारों में रहता है। उसे चिकनी-चुपड़ी बातें करनी नहीं आती। उसे टहलाना नहीं आता। उसे जनता को बहलाना नहीं आता फिर भी उस जैसों का राजनीति में रहना सुखद लगता है शायद ऐसे ही दिमाग की देश को जरूरत है। उसे भले ही अफसोस ना रहे पर हर सही आदमी को इस बात का मलाल हमेशा रहेगा कि देश में जूता कल्चर की शुरूआत इसी नाम से हुई। एक सही शख्स से गलत शुरूआत।
पालानीअप्पन चिदम्बरम
0-तमिलनाडु में शिवगंगा जिले के कंडानूर शहर में चेट्टीनाद शाही परिवार में 16 सितंबर,1945 को जन्म। चेन्नई में स्कूली शिक्षा। मद्रास कालेज से एलएलबी। हार्वर्ड विवि से एमबीए। 69 में चेन्नई हाईकोर्ट में वकालत की शुरूआत। 84 में सीनियर वकील। सुप्रीमकोर्ट में भी चैम्बर। नलिनी से शादी। कार्ति बेटा। देश-विदेश में तमाम मुकदमें लड़े। राजीव गांधी युग में राजनीति की ओर। पहली बार 84 में शिवगंगा सीट से लोकसभा में। इसके बाद कभी इस सीट से नहीं हारे। 21 सितंबर 1985 को राजीव सरकार में वाणिज्य मंत्रालय में राज्य मंत्री। चाय की कीमतों पर अंकुश का जिम्मा। श्रीलंका सरकार की आलोचना। विभाग बदला। 86 में केंद्र में स्टेट होम मिनिस्टर। 89 में कांग्रेस की हार। 91 में राजीव की हत्या। कांग्रेस फिर सत्ता में। मनमोहन वित्त मंत्री। चिदम्बरम को वाणिज्य ( स्वतंत्र)। 96 तक रहे। एक्जिम पालिसी में आमूल-चूल परिवर्तन। मोंटेक सिंह अहलुवालिया व मनमोहन संग तिकड़ी ने देश में आर्थिक उदारवाद के दरवाजे खोले। देश तरक्की की ओर। 96 में कांग्रेस से नाता तोड़ा। तमिल मनीला कांग्रेस ज्वाइन। सयुंक्त मोरचा सरकार में वित्त मंत्री। 98 तक रहे। 04 में फिर मनमोहन सरकार में इसी पद पर। मुंबई पर हमले के बाद 08 में शिवराज पाटिल की जगह होम मिनिस्टर। राजीव गांधी ट्रस्ट के सदस्य। विवादों में भी घिरे। एनरान के वकील रहे। दाबोल पावर प्रोजेक्ट में दामन पर दाग। 92 में शेयर घोटाला कारण मंत्री पद भी छोड़ा। वित्त मंत्री के रूप में आयकर लादने व छूट न देने पर लगातार आलोचना। वेदांता कंपनी को लेकर भी 03 में बवाल। 06 में लाभ के पद पर रहने के आरोप। राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग को जांच की इजाजत दी। बेदाग। बेटे को लेकर •भी तमाम आरोप। किसानों की कर्ज माफी का बड़ा फैसला। हाल में 7 अप्रैल को पहली बार एक पत्रकार जरनैल सिंह ने जूता फैंका। पी सी ने माफ किया।
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