शनिवार, 2 मई 2009

पाक पर फैसला बनेगा नापाक




देशपाल सिंह पंवार
यह सुना भी था,देखा भी था कि खेल माहौल को सुधारता भी है और रिश्तों को मजबूत भी बनाता है पर उससे रिश्ते खराब हो रहे हैं या और होंगे यह हम देख रहे हैं,आने वाले समय में और देखेंगे। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच तमाम तनाव के बावजूद रिश्तों को सुधारने में क्रिकेट हमेशा मददगार ज्यादा साबित होता आया है। अब ऐसा नहीं है। मुंबई अटैक और लाहौर में श्रीलंका टीम पर हमले के बाद क्रिकेट बिरादरी ने पाक से मुंह मोड़ लिया है। कोई वहां खेलने को तैयार नहीं है। ये फैसले गलत नहीं ठहराये जा सकते। हिंदुस्तान क्रिकेट बोर्ड इसे अपनी जीत मान सकता है लेकिन इस देश से विश्वकप की मेजबानी छीनना और लाहौर से आयोजन समिति का मुख्यालय मुंबई शिफ्ट करने का फैसला चाहे फिलहाल सही नजर आता हो लेकिन इसके कड़वे नतीजे सामने आएंगे इस आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। हिंदुस्तान की तरह जिस देश में हर बंदा क्रिकेट का जुनूनी हो, ऊपर से आतंकवाद का बोलबाला हो वो देश इस तरह के फैसले से एक बार चुप बैठ सकता है लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या उस देश के कट्टर आतंकी चेहरे इस आयोजन को सफलतापूर्वक होने देंगे? हिंदुस्तान पहले से ही उनके निशाने पर है। बांग्लादेश में उनका राज है। श्रीलंका पहले ही घर की लड़ाई से बेजार है। खुदा ना करे ऐसा कुछ हो लेकिन जिस तरह के हालात हैं ऐसे में आखिर इस बात की गारंटी कौन लेगा कि विश्वकप के किसी भी मैच में कोई अनहोनी नहीं होगी? अगर ऐसा कुछ हुआ तो फैसला लेने वाले क्रिकेट बोर्ड के अधिकारी 7 स्टार होटलों में जाम लड़ाते नजर आएंगे। कलंक न श्रीलंका के माथे पर लगेगा और ना ही बांग्लादेश के-सारी छिछालेदर हिंदुस्तान की होगी। रन और विकेट के इस खेल से अमीर होती इस खास बिरादरी को आखिर कब ये समझ में आएगा कि क्रिकेट चाहे वो चलाते हैं लेकिन उनके बेतुके फैसलों का खामियाजा निर्दोष जनता और किसी देश को झेलना पड़ सकता है। अगर उनकी ये समझ में नहीं आता तो अब समय आ गया है कि जब भी किसी सिरीज या आयोजन से रिश्तों पर फर्क पड़ने की आशंका दिखती हो तो वहां अंतिम फैसला लेने का अधिकार सरकार का होगा चंद अमीरों का नहीं। इतिहास गवाह है कि पाक से हम तीन जंग लड़ चुके हैं। हालात इससे ज्यादा खराब रहे हैं लेकिन समय गुजरा- रिश्तों पर जमी धूल साफ होती रही। फिर इस बार इतना जल्दी फैसला करने की कौन आफत आ गई थी? दो साल बाद विश्वकप होना है। ऐसा भी नहीं है कि ओलंपिक खेलों की तरह 10-20 नए स्टेडियम खड़े करने हों या तैयारियों के लिए 5-7 साल का समय चाहिए। इंडियन बोर्ड अगर एक हफ्ते में आईपीएल दूसरे देश में करा सकता है तो फिर देश में विश्वकप कराने में उसे कितना समय लगता? अगर दो साल में रिश्ते फिर सुधर गए तो......

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें