शनिवार, 2 मई 2009

गाडफादर बनने की चाह


देशपाल सिंह पंवार
वो 14 साल की उम्र से हिंदुओं विरोधी नारे लगाता आ रहा है। वो ना राम के अस्तित्व को मानता। ना रामसेतु को सही ठहराता। वो ना सीता के वजूद को मानता और ना ही गीता पर विश्वास रखता। वो रावण के होने पर सवाल खड़े करता है पर श्रीलंका पर बवाल करता रहता है। वो जब चाहता है सरकार से फैसले बदलवा लेता है। श्रीलंका पर दबाव डलवा लेता है। वो किसी की परवाह नहीं करता। जो बोल देता है वो पूरा होना चाहिए वरना..। उसके तथा उसकी पार्टी के दामन पर राजीव गांधी की हत्या के दाग हैं। फिर भी वो केंद्र की सत्ताधारी यूपीए सरकार का पार्ट है। कांग्रेस उसके साथ है। मनमोहन सरकार लिट्टे को आतंकी संगठन कहती है। वो लिट्टे को आसमान पर बिठाता है। वो शुरू से लिट्टे के साथ है। समर्थक है। मददगार है। लिट्टे का दोस्त है। यह बात देश में और कोई दूसरा नेता सीना तानकर नहीं कह सकता। कहेगा तो चल नहीं सकता पर वो चल ही नहीं रहा। दौड़ रहा है। वो केंद्र को आंख दिखाता है। अनशन नौटंकी से जंग रूकवा लेता है। वो कोई माफिया डान नहीं बल्कि संवैधानिक पद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा राजनेता है। जो कानून की शपथ लेता है पर अपने ही कानून चलाता है। कारण- वो देश का अकेला ऐसा नेता है जो 60 साल से कोई चुनाव नहीं हारा। कारण -वो यूपीए की सरकार को चलाने के लिए सांसदों को जिताकर लाता है। कारण-उसके एक इशारे पर तमिलनाडु की जनता खूनखराबे पर उतर आती है। यही अतिआत्मविश्वास है कि वो जनता की ताकत के सहारे अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करने से कदापि नहीं चूकता। वो सही मायनों में जानता है कि जनता ही जनार्दन है। उसे खुश करने को वो सिर्फ तमिलों की बात करता है लेकिन केवल अपने या अपनों के बारे में सोचता है, करता है। इस सिलसिले में सरकारिया आयोग की सिफारिशों को दीमक चट कर गई। वो गरीब घर में चाहे पैदा हुआ पर आज वो भी अमीर है और उसके सारे दूर-दूर तक के नातेदार और रिश्तेदार भी, जिसने उसके पैर छूए वो केंद्र में मंत्री तक बन गए जिसने आंख उठाई वो धूल चाट गए। उसे गाड (वो नहीं मानता) ने सब कुछ दिया पर आज भी उसका पेट खाली है। 40 साल से द्रमुक का मुखिया है। किसी का नंबर आने नहीं देता। पांच बार मुख्यमंत्री बन चुका है पर किसी को पास फटकने नहीं देता। 85 साल की उम्र हो चुकी है। मुंह में दांत नहीं रहे। पेट में आंत मांसाहारी लंच पचा नहीं पाती। घुटने शरीर का बोझ झेल नहीं पाते, पर होम मिनिस्टर किसी को बनने नहीं देता। वो सारी करनी जानता है। उसके विरोधी भी जानते हैं। अगर ऐसा करेगा तो होम स्वाहा होने में वक्त नहीं लगेगा। वैसे यह भी सच है कि वो तमिलनाडु का सबसे बड़ा विद्वान है। पर यह भी कड़वा सच है कि वो फिल्मी कहानियां लिखते-लिखते उन्हें सच का अमली जामा पहनाने वाला इंसान से ऊपर का कैरेक्टर खुद को मानने लगा है। इस बार भी उसे हाथ के साथ की नहीं, हाथ को उसके साथ की जरूरत है। यह जरूरत फिर गुल खिलाएगी देखते रहिए।
मुत्थूवेल करुणानिधि

0-तमिलनाडु में तंजोर जिले का थिरूक्कुआवल्लेई गांव-3 जून 1924 को बेहद गरीब परिवार में जन्म। मां मंदिर डांसर । किसी तरह गुजर-बसर। 6 बेटे, एक बेटी। जस्टिस पार्टी के अलगिरीस्वामी के व्याख्यान सुनकर 14 साल की उम्र में राजनीति में प्रवेश। हिंदु विरोधी आंदोलन में कूदे। अपनी उम्र का गैंग बनाया। फिर छात्र संगठन खड़ा किया। रोजी-रोटी के लिए 20 साल की उम्र में फिल्मों में स्क्रिप्ट राइटर। 70 से ज्यादा फिल्में। राजकुमारी पहली फिल्म। साहित्य जगत में बड़ा नाम। 100 से ज्यादा किताबें। बोली प्रेम की धारा को बहाया। 42 में मुरासोली अखबार निकाला। पत्रकार और कार्टूनिस्ट का रोल। 50 साल से हर दिन पार्टी कार्यकर्ताओं के नाम रोजाना एक पत्र प्रकाशित। अब भी संपादक के रोल में। सरकार का गजेटियर निकाला। 1957 में कुलिथालेई सीट से पहली बार विधायक बने। 11 बार सदन में। एक बार 84 में विधानपरिषद में। कभी चुनाव नहीं हारे। आजादी के बाद 14 बार आंदोलन में जेल गए। 69 में अन्नादुरैई की मौत के बाद द्रमुक के अब तक मुखिया। सबसे लंबा कार्यकाल। 69-71,71-74,89-91,96-01,06 से अब तक पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री। पूंजी निवेश को बढ़ावा। राज्य में कोई ऐसा पद नहीं जिस पर ना रहे हों। 04 में तमिलनाडु और पांडिचेरी में यूपीए को 40 सीटें दिलायी। तमिल हितों के घनघोर समर्थक। लिट्टे के साथ। लिट्टे प्रमुख के दोस्त। किसी भी सीमा तक जाने की जिद। जैन आयोग ने राजीव गांधी की हत्या में करुणानिधि और द्रमुक पर उंगली उठाई। लगातार विवादित। 27 अप्रैल को लिट्टे पर हमला रोकने के लिए अनशन। जयललिता से 36 का आंकड़ा। करप्शन के ढेरों आरोप। अब अथाह दौलत। सरकारिया आयोग ने भी दोषी ठहराया। बेटों और नातेदारों को आगे बढ़ाया। खजाना लुटाया। किसी दूसरे को उठने नहीं दिया। सब पर करप्शन के तमाम मामले। बेटे स्टालिन के बढ़ते असर से तमाम नेताओं ने साथ छोड़ा। विरोधियों पर कातिलाना हमलों के आरोप। ना राम का अस्तित्व मानते ना रामसेतु का आधार। मांसाहारी से अब शाकाहारी।

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