देशपाल सिंह पंवार
सबको पता था कि अंतरिम बजट है कुछ ज्यादा मिलने वाला नहीं पर कुछ नहीं मिलेगा ये किसी को अंदाजा नहीं था। सरकार की झोली इतनी खाली है सब हैरत में हैं। कर्मचारी आयकर में छूट की आस लगा रहे थे। उद्योग जगत राहत की आस में था। युवा पीढ़ी सपने देख रही थी कि नौकरी बचेंगी भी और मिलेंगी भी,बाजार भी चाहता था कि चुनाव सिर पर है कुछ न कुछ ऐसा जरूर होगा ताकि सबको फील गुड का एहसास रहे पर ये हो ना सका। पहाड़ खोदने पर चुहियां तक नहीं निकली। न जवान की बात, न किसान की। सरकार कुछ देने नहीं लेने जा रही है इसका एहसास तब हो गया था जब संसद में प्रणव मुखर्जी सरकार की उपलब्धियों पर ही ज्यादा बोलते चले गए। बिल्कुल उसी अंदाज में जैसे कोई ठेकेदार ठेका पाने के लिए उपलब्धियां गिनाता है। इसके लिए प्लेटफार्म तो सही था पर वक्त नहीं। कड़वे फैसले की बात करना समझ से परे है। इस बजट (?) में फैसला सिर्फ इतना था कि कुछ नहीं देना है? अपने हाथ भी खाली और जनता के भी,सबसे बड़ा सवाल यही है कि ऐसा क्यों हुआ? क्यों सबके मुंह से एक ही शब्द निकल रहा है-बकवास। क्यों ऐसा हुआ? चुनाव के वक्त अमूमन ऐसा दो ही सूरत में होता है या तो सरकार इस बात को लेकर आश्वस्त हो कि वह वापस आ रही है या फिर यह मान चुकी हो कि वह जा रही है? सच क्या है ये कांग्रेस ही बता सकती है यूपीए नहीं। अगर लालू राहत दे सकते हैं तो फिर मनमोहन क्यों नहीं? खैर चाहे कुछ ना मिला हो पर मजबूरी में ही सही एक बात जरूर ऐसी हो गयी है जो आने वाले समय में देश को फिर सोने की चिड़िया में बदल सकती है और वो है सरकार का गांवों की ओर रुख, जहां देश बसता है। जिसे सब बिसरा चुके थे। शायद समझ में आ गया है- शहरों की ओर दौड़ने का अंजाम। (16.2.09)
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