देशपाल सिंह पंवार
नवंबर से पहले जिस नाम को कोई नहीं जानता था आज उस अजमल आमिर कसब को सब हिकारत की नजर से देखते हैं। वो देश का सबसे महंगा कैदी तो है ही-सबसे महत्वपूर्ण भी है। अपने साथियों के साथ जिस तरह इस आतंकवादी ने मुंबई में 180 लोगों का खून बहाया, 72 घंटे तक आतंक फैलाया,उसे मिटाया नहीं जा सकता। सारी दुनिया ने उस कहर को अपनी आंखों से देखा। जो आंखों से देखा जाता है वह सच होता है और ऐसे सच के लिए किसी गवाह, किसी चार्जशीट की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। कसब के चाहने वालों को शुक्र मनाना चाहिए कि हिंदुस्तान एक लोकतांत्रिक देश है जहां कसब जैसे घिनौने चेहरे तब तक जिंदा रहते हैं जब तक कानूनन वे अपराधी साबित नहीं हो जाते और कोर्ट उन्हें सजा नहीं सुना देती। सोचिए इसी तरह का सीन अगर पाकिस्तान में हुआ होता तो अब तक बिना किसी सुनवाई के निर्दोष को भी सूली पर चढ़ा दिया जाता। कसब जैसों के आकाओं को तालिबानी कानून और भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जमीन-आसमान के अंतर का एहसास अब हो जाना चाहिए। यूं तो कसब के गुनाह का सबको पता है फिर भी जिस तरह महज तीन माह में कसब समेत 33 आतंकियों के खिलाफ संगीन मामलों की 11500 पेज की चार्जशीट दाखिल की गई है उसके लिए जांच दल की तारीफ करनी होगी। 200 गवाह हैं। मामला विशेष अदालत में चलेगा, जिस तरह के गुनाह हैं उसे देखते हुए सबसे बड़ी सजा यानि फांसी तक कम है लेकिन देश की जनता और पीड़ित परिवार यही आस लगाए बैठे हैं कि कसब जैसे आतंकवादियों को जल्दी से जल्दी सूली पर चढ़ाया जाए। इसमें कोई दो राय नहीं कसब हिंदुस्तान के पास पाकिस्तान के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है लेकिन फैसले और उसके क्रियान्वयन में अफजल गुरू की तरह की देरी जनता का विश्वास भी डिगायेगी और आतंकवादियों के हौसलों को भी बढ़ायेगी। हिंदुस्तान और यहां के कानून को सख्त होना ही होगा। पाक से रिश्तों से बढ़कर है देश यह समझना भी होगा और दिखाना भी-(२८.2.09)
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