देशपाल सिंह पंवार
प्रशासनिक सुधार आयोग की अगर चली तो देश के सरकारी महकमों में मूल्यांकन प्रणाली लागू होगी। उसके नतीजों के आधार पर 20 साल की सेवा के बाद नौकरी जाएगी। अफसरों को 13 साल की सेवा के बाद ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलेगी। यूपीएससी एक्जाम के अवसरों में कमी होगी। इसके अलावा आयोग की सिफारिशों में बहुत कुछ ऐसा है जो पढ़ने में तो अच्छा लग रहा है और अगर हुबहू लागू हो गया तो कहने ही क्या? देश में काम की क्रांति आ जायेगी। पर आज की तारीख में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस देश में बेईमानी की तूती बोलती हो, दस में से सात अफसर और सरकारी कर्मचारी दो नंबर की माया की छाया में रहते हों वहां ऐसी सिफारिशें क्या आसानी से लागू हो पाएंगी? निकम्मों की जिस फौज की तरफ ये उंगली उठाई जाएगी क्या ऊपर से नीचे तक का वो करप्ट तंत्र आसानी से घुटने टेक देगा? क्या इसके विरोध का डर उनके आकाओं को नहीं सतायेगा? सवाल यह बड़ा है कि जिस देश में वोटों की राजनीति का बोलबाला हो, दागी नेताओं का पूरा मेला हो वहां क्या एक बड़े अमले को एक झटके में अलग करने की कोई सरकार हिम्मत जुटा पाएगी? सवाल यह भी है कि अकेले अफसर और कर्मचारी ही क्यों मूल्यांकन की कसौटी पर कसे जाएं अगर ढांचा सुधारना ही है तो फिर राजनेताओं से इसकी शुरूआत क्यों न हो? चपरासी स्नातक और मंत्री अंगूठा छाप की थ्योरी पर कब तक ये देश चलेगा? वो साठ में फाइल उठाने लायक नहीं रहता पर नेता देश चलायेगा क्या यह सही है? जब तक इसका कोई कानून नहीं बनेगा यह दावा करना कठिन है कि आयोग की ये सिफारिशें सरकार मानेगी। मानेगी तो क्या हश्र होगा सोचा जा सकता है। वैसे यह काम वही सरकार कर पाएगी जिसकी इच्छा शक्ति मजबूत होगी। क्या हमारी राजनीति में इसका एहसास होता है? यह तय है कि इस रिपोर्ट पर बातें ढेरों होंगी,सवाल भी खूब खड़े होंगे और लागू हो गयी तो ढेरों डर भी सत्ता को सतायेंगे। कुछ भी हो पर हर ईमानदार शख्स यही चाहता है कि हमारा सरकारी ढांचा ऐसा हो जिसमें जनहित न केवल सर्वोपरि हो बल्कि उसका जनता को एहसास भी हो। काश ऐसा हो। (14.12.08)
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