राजनेताओं की घटिया सोच का-गद्दी के लिए लोच का-जनता के पांव की मोच का। नेतागिरी से पैदा जंगलराज का-सफेदपोश की देन गुंडाराज का-जनता पर गाज का। बेईमानी के बेहिसाब वार का,जातियों के तकरार का, नपुंसक-निकम्मी सरकार का। बच्चों से दुर्व्यवहार का, बेरोजगारों पर मार का ,अबलाओं पर जारी अत्याचार का। हाकिमों की घूसखोरी का, कालाबाजारियों की जमाखोरी का,टूटती डोरी का।
रविवार, 29 मार्च 2009
नेताओ ने मारा
देशपाल सिंह पंवार
राजनीती संभावनाओ का खेल है। ताज तक पहुंचना ही अंतिम लक्ष्य है। इसके लिए सारे जुगाड़ किए जाते हैं। चुनाव से पहले ढेरों बेमेल गठजोड़ बनते हैं और टूटते हैं। खासकर सिद्धांतों की राजनीति की धारा जब संकरी होती जाती है तो आयाराम-गयाराम की सड़क बहुत चिकनी हो जाती है, जिस पर ढेरों फिसलते चले जाते हैं। देश की राजनीति का आजकल यही हाल है। गद्दी बिना रहा नहीं जा सकता। अपने बूते जीत नहीं सकते तो फिर जो हाथ सामने आता है उसे थाम लिया जाता है। मीडिया के जरिए प्रचार किया जाता है या कराया जाता है कि गठजोड़ बेमिसाल है-दिशा बदल देगा। चुनाव होते-होते लुटिया डूब जाती है। 90 के दशक से यही ढर्रा चल रहा है। हर बार चुनाव से पहले पेट में दर्द होने लगता है। तीसरा मोरचा बनने लगता है और बनकर बैठ जाता है। पहले कांग्रेस अछूत थी फिर बीजेपी हो गई और अब ये दोनों पार्टियां उन क्षेत्रीय क्षत्रपों के निशाने पर हैं जो अपने-अपने राज्यों में डूबते जा रहे हैं लेकिन केंद्र की राजनीति के मांझी की तरह व्यवहार करते हैं। इस बार फिर तीसरा मोरचा बन रहा है। जो कमल और हाथ का साथ नहीं देना चाहता वो इनके साथ हो सकता है। नया नाम तलाशा जा रहा है। ज्योति बसु अगर ये कहते हैं कि तीसरा मोरचा सत्ता में नहीं आ सकता तो यह गलत नहीं है। तीसरे मोरचे में शामिल नेता तक हकीकत जानते हैं लेकिन वे यह जरूर मानते हैं कि एक होकर वे इतनी सीटें जरूर ले आएंगे कि किसी की सरकार बनवाने में उनकी महत्ता खास रहेगी। यही खास बने रहना उनकी इकलौती राह भी है और चाह भी, वे किंग नहीं हो सकते लेकिन किंग मेकर बने रहना चाहते हैं यही राजनीति के इन पिटे हुए मोहरों की इच्छा है और यही गठजोड़ की राजनीति के दौर की सबसे बड़ी निराशा है। तीसरे मोरचे से लड़ेंगे, जहर घोलेंगे और चुनाव के बाद ढेरों सत्ता की गोद में बैठे नजर आएंगे। हर बार इतिहास को सिखाने की कोशिश होती है लेकिन नतीजा,हैरत तो इसी बात की है कि जनता भी इतिहास से सबक नहीं सीखती और स्वार्थ की राजनीति करने वालों को मंझधार में नहीं डुबोती। (18।3।09)
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