रविवार, 29 मार्च 2009

मुन्नाभाई

देशपाल सिंह पंवार
आजादी जिन्होंने दिलायी-पहले उन्होने राजनीति की। राज किया। उनका हक था। उसी दौर में जनसेवा करो-राजनीति में आओ की थीम ने जन्म लिया और शिखर को भी छुआ। वे नाम से भी जनसेवक थे और काम से भी,जनता की पिच के इन नायकों का अलग अंदाज था और राजनीति का अलग मिजाज था। दौर गुजरता गया। कारवां चलता गया। परिवारवाद फैलता गया। धनबल बढ़ता गया। बाहुबल पनपता गया। जनसेवक की धारा घटती गयी। अपराधीकरण, बेईमानी और स्वार्थ की मैली धारा ने राजनीति को ऐसा मारा कि अब विशुद्ध रूप से राजनीति संभावनाओं का खेल है। संख्या बल का मेल है। इसी ने नया चोला पहनाया-जो स्टार है, बिकाऊ है, धनवान है, नामवाला है उसका ही बोलबाला है। जन के राजनेता जमीन की बजाय आसमान से टपक रहे हैं। दागी हैं, कोई बात नहीं, हत्यारे हैं कोई परवाह नहीं। स्वागत है। पहले नीचे से राजनीति शुरू होती थी अब आसमान से। जननायकों की जगह मैदान और स्क्रीन के नायकों की कीमत है। हर पार्टी में, हर राज्य में। कांग्रेस ने सबको राह दिखाई तो फिर सपा का क्या दोष? यह पार्टी तो महानायक के सहारे चल ही रही है। मुलायम संग अब मुन्ना राजनीति करेंगे। स्क्रीन पर गांधीगिरी की, अब जमीन पर नेतागिरी करेंगे। विदेशी कारों में सवारी करने वाले संजय दत्त अब लखनऊ में साइकिल की सवारी करेंगे। कागज पर यह परिवर्तन गांधीगिरी का एहसास कराता है लेकिन हकीकत ठीक उल्ट है। लोकतंत्र है, सब करने की आजादी है। पर कई सवाल सामने हैं। क्या वास्तव में वे राजनीति के लायक हैं? क्या उन्हें चुनाव की छूट मिलनी चाहिए? क्या राजनीति का उनके पास वक्त है? क्या वे जनसेवा कर पायेंगे? क्या वे सफल हो पायेंगे? इनका जवाब खुद मुन्नाभाई नहीं जानते। जानते हैं तो फिर वो नकारात्मक ही होगा। अचानक ऐसा क्या हुआ कि अपना धंधा छोड़ वे नेता बनने जा रहे हैं? हकीकत यही है कि चाहे राजनीति को जरूरत ना हो पर सपा और संजय दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। सपा के स्टार चमक खो चुके हैं। संजय के स्टार गर्दिश में हैं। सांसद बनेंगे। पिंड छुटेगा। उस जमात में शामिल हो जायेंगे जहां पहले ही ऐसा जमघट है। (18.1.09)

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