रविवार, 29 मार्च 2009

गलत रास्ता

देशपाल सिंह पंवार
इंसान हो या देश दुश्मनों से समझौते की बात दो ही कारणों से करता है। या तो वो खुद को कमजोर महसूस करने लगता है और किसी तरह इज्जत बचाने के बहाने तलाशता है।या फिर दुश्मन कैंप में गलतफहमी पैदा करने की रणनीति के तहत नरम रवैया अपनाता है। उदारपंथी तालिबानियों से बात की अमेरिकी सोच इससे इतर नहीं है। 8 साल तक चोट खाने के बाद उसे याद आया है कि तालिबानियों का एक गुट उदारपंथी है। वैसे सब जानते हैं कि तालिबान नाम हिंसा, आतंक और जंगलराज का घिनौना चेहरा है। पता नहीं ओबामा को उदार तालिबानी कहां नजर आ गए? हो सकता है कि दौलत के पुजारी कुछ नकली तालिबानी सरदार अमेरिका को नजर आ गए हों या पुराने समर्थक जिनसे बातचीत की पहल का नाटक खेला जायेगा। इससे तालिबानी गुटों में आपस में लड़ाई तो होगी साथ ही अमेरिका को इस देश से निकलने का रास्ता मिल जायेगा। चाहे जो हो लेकिन यह तय है कि यह देश इतिहास से कदापि सबक नहीं सीखता। जोश में आकर यह महाबली राष्ट्र हमला करने में तो देरी नहीं करता लेकिन उसके बाद उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पाता। बिल्ली की तरह उसे दुम दबाकर दौड़ना पड़ता है। क्यूबा जैसा छोटा सा देश आज तक उसके काबू में नहीं आया। वियतनाम की हार से उसने सबक नहीं सीखा। इराक पर दादागिरी तो दिखाई लेकिन वहां भी इज्जत बचती नजर नहीं आ रही है। यही हश्र अफगानिस्तान में हो रहा है। जिन तालिबानियों को उसने सोवियत संघ को मात देने के लिए खड़ा किया वही जड़ खोदने में सफल हो गए हैं। उसने पाकिस्तान पर पानी की तरह डालरों की बरसात की लेकिन न तो उसे ओसामा बिन लादेन मिला और न ही तालिबानी खत्म हुए। हां हालत जरूर पतली हो गई। अब हर अमेरिकी मानता है कि जंग ने ही अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क किया है। सारी कमाई मोर्चो पर लुट रही है। अमेरिकी कंगाल हो गए हैं। इज्जत से निकलने का रास्ता मिलते ही जंग से नाता तोड़ने का एक यह बड़ा कारण रहेगा। हैरत इसी बात की है कि पाकिस्तान कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक रहा है और अमेरिका उदारपंथियों को तलाशता घूम रहा है। इस सोच का अंजाम क्या होगा यह सारी दुनिया देखेगी भी और झेलेगी भी,(9.3.09)

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